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Sanjiv verma 'salil''s Blog – March 2011 Archive (13)

सामयिक गीत: राम जी मुझे बचायें.... -- संजीव 'सलिल'

सामयिक गीत:

राम जी मुझे बचायें....

-- संजीव 'सलिल'

*

राम जी मुझे बचायें....



एक गेंद के पीछे दौड़ें ग्यारह-ग्यारह लोग.

एक अरब काम तज देखें, अजब भयानक रोग..

राम जी मुझे बचायें,

रोग यह दूर भगायें....

*

परदेशी ने कह दिया कुछ सच्चा-कुछ झूठ.

भंग भरोसा हो रहा, जैसे मारी मूठ..

न आपस में टकरायें,

एक रहकर जय पायें...

*

कड़ी परीक्षा ले रही, प्रकृति- सब हों एक.

सकें सीख जापान से, अनुशासन-श्रम नेक..

समर्पण-ज्योति… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on March 31, 2011 at 12:06pm — 3 Comments

मुक्तिका: हुआ सवेरा संजीव 'सलिल

मुक्तिका:

हुआ सवेरा

संजीव 'सलिल'

*

हुआ सवेरा मिली हाथ को आज कलम फिर.

भाषा शिल्प कथानक मिलकर पीट रहे सिर..

भाव भूमि पर नभ का छंद नगाड़ा पीटे.

बिम्ब दामिनी, लय की मेघ घटा आयी घिर..

बूँद प्रतीकों की, मुहावरों की फुहार है.

तत्सम-तद्भव पुष्प-पंखुरियाँ डूब रहीं तिर..

अलंकार की छटा मनोहर उषा-साँझ सी.

शतदल-शोभित सलिल-धार ज्यों सतत रही झिर..

राजनीति के कोल्हू में जननीति वृषभ क्यों?

बिन पाये प्रतिदान रहा बरसों…

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Added by sanjiv verma 'salil' on March 31, 2011 at 9:30am — 1 Comment

नवगीत: कब होंगे आज़ाद हम संजीव 'सलिल'

नवगीत

 

कब होंगे आज़ाद हम



संजीव 'सलिल'

*

कब होंगे आजाद?

कहो हम

कब होंगे आजाद?



गए विदेशी पर देशी

अंग्रेज कर रहे शासन

भाषण देतीं सरकारें पर दे

न सकीं हैं राशन

मंत्री से संतरी तक कुटिल

कुतंत्री बनकर गिद्ध-

नोच-खा रहे

भारत माँ को

ले चटखारे स्वाद

कब होंगे आजाद?

कहो…

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Added by sanjiv verma 'salil' on March 26, 2011 at 12:29am — 2 Comments

मुक्तिका: गलत मुहरा ----- संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:                                                                          



गलत मुहरा



संजीव 'सलिल'

*

सही चहरा.

गलत मुहरा..



सिन्धु उथला,

गगन गहरा..



साधुओं पर

लगा पहरा..



राजनय का

चरित दुहरा..



नर्मदा जल

हहर-घहरा..



हौसलों की

ध्वजा फहरा..



चमन सूखा

हरा सहरा..



ढला सूरज

चढ़ा कुहरा..



पुलिसवाला

मूक-बहरा..



बहे पत्थर…

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Added by sanjiv verma 'salil' on March 21, 2011 at 6:40pm — 7 Comments

मुक्तिका: मन तरंगित ---- संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:                                                                                         



मन तरंगित



संजीव 'सलिल'

*

मन तरंगित, तन तरंगित.

झूमता फागुन तरंगित..



होश ही मदहोश क्यों है?

गुन चुके, अवगुन तरंगित..



श्वास गिरवी आस रखती.

प्यास का पल-छिन तरंगित..



शहादत जो दे रहे हैं.

हैं न वे जन-मन तरंगित..



बंद है स्विस बैंक में जो

धन, न धन-स्वामी तरंगित..



सचिन ने बल्ला घुमाया.…

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Added by sanjiv verma 'salil' on March 21, 2011 at 6:39pm — No Comments

मुक्तिका: हुई होली, हो रही, होगी हमेशा प्राण-मन की --- संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:



हुई होली, हो रही, होगी हमेशा प्राण-मन की



संजीव 'सलिल'

*

भाल पर सूरज चमकता, नयन आशा से भरे हैं.

मौन अधरों का कहे, हम प्रणयधर्मी पर खरे हैं..



श्वास ने की रास, अनकहनी कहे नथ कुछ कहे बिन.

लालिमा गालों की दहती, फागुनी किंशुक झरे हैं..



चिबुक पर तिल, दिल किसी दिलजले का कुर्बां हुआ है.

भौंह-धनु के नयन-बाणों से न हम आशिक डरे हैं?.



बाजुओं के बंधनों में कसो, जीवन दान दे दो.

केश वल्लरियों में गूथें कुसुम, भँवरे… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on March 20, 2011 at 10:24am — No Comments

नवगीत: तुमने खेली हमसे होली ----संजीव 'सलिल'

नवगीत:



तुमने खेली हमसे होली



संजीव 'सलिल'

*

तुमने खेली हमसे होली

अब हम खेलें.

अब तक झेला बहुत

न अब आगे हम झेलें...

*

सौ सुनार की होती रही सुनें सच नेता.

अब बारी जनता की जो दण्डित कर देता..

पकड़ा गया कलेक्टर तो क्यों उसे छुडाया-

आम आदमी का संकट क्यों नजर न आया?

सत्ता जिसकी संकट में

हम उसे ढकेलें...

*

हिरनकशिपु तुम, जन प्रहलाद, होलिका अफसर.

मिले शहादत तुमको अब आया है अवसर.

जनमत का हरि क्यों न मार… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on March 19, 2011 at 11:52pm — 2 Comments

भज गोविन्दम् (मूल संस्कृत, हिन्दी काव्यानुवाद, अर्थ व अंग्रेजी अनुवाद सहित) - संजीव 'सलिल'







भज गोविन्दम् 

(मूल संस्कृत, हिन्दी काव्यानुवाद, अर्थ व अंग्रेजी अनुवाद सहित)


                                                                             

भज गोविन्दं भज गोविन्दं, गोविन्दं भज मूढ़मते।

संप्राप्ते सन्निहिते काले, न हि न हि रक्षति डुकृञ् करणे ॥१॥…




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Added by sanjiv verma 'salil' on March 13, 2011 at 2:34pm — 2 Comments

सामयिक नव गीत: मचा कोहराम क्यों?... संजीव वर्मा 'सलिल

सामयिक नव गीत



मचा कोहराम क्यों?...



संजीव वर्मा 'सलिल'

*

(नक्सलवादियों द्वारा बंदी बनाये गये एक कलेक्टर को छुड़ाने के बदले शासन द्वारा ७ आतंकवादियों को छोड़ने और अन्य मांगें मंजूर करने की पृष्ठभूमि में प्रतिक्रिया)

अफसर पकड़ा गया

मचा कुहराम क्यों?...

*

आतंकी आतंक मचाते,

जन-गण प्राण बचा ना पाते.

नेता झूठे अश्रु बहाते.

समाचार अखबार बनाते.



आम आदमी सिसके

चैन हराम क्यों?...

*

मारे गये सिपाही अनगिन.

पड़े… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on March 9, 2011 at 7:46am — 2 Comments

आचार्य श्यामलाल उपाध्याय की कवितायेँ :

आचार्य श्यामलाल उपाध्याय की कवितायेँ :

मित्रों!

प्रस्तुत हैं कोलकाता निवासी श्रेष्ठ-ज्येष्ठ हिंदीसेवी आचार्य श्यामलाल उपाध्याय की कुछ रचनाएँ

१. कवि-मनीषी…

Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on March 9, 2011 at 7:32am — 2 Comments

द्वादश ज्योतिर्लिंग / बारह ज्योतिर्लिंग हिंदी अनुवाद: संजीव 'सलिल'

द्वादश ज्योतिर्लिंग / बारह ज्योतिर्लिंग



हिंदी अनुवाद: संजीव 'सलिल'

*

सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम.

उज्जयिन्यां महाकालमोंकारममलेश्वरं.१.



सोमनाथ सौराष्ट्र में, मलिकार्जुन श्रीशैल.

ममलेश्वर ओंकार में, महाकाल उज्जैन.१.



परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशंकरं.

सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने.२.



भीमशंकर डाकिन्या, परलय वैद्येश.

नागेश्वर दारुकावन, सेतुबंध रामेश.२.



वाराणस्यां तु विश्वेशं त्र्यंबकं… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on March 7, 2011 at 5:39pm — 2 Comments

एक कविता: धरती _____ संजीव 'सलिल'

एक कविता

धरती

संजीव 'सलिल'

*

धरती काम करने

कहीं नहीं जाती

पर वह कभी भी

बेकाम नहीं होती.

बादल बरसता है

चुक जाता है.

सूरज सुलगता है

ढल जाता है.

समंदर गरजता है

बँध जाता है.

पवन चलता है

थम जाता है.

न बरसती है,

न सुलगती है,

न गरजती है,

न चलती है

लेकिन धरती

चुकती, ढलती,

बंधती या थमती नहीं.

धरती जन्म देती है

सभ्यता को,

धरती जन्म देती है

संस्कृति को.

तभी ज़िंदगी

बंदगी बन पाती है.

धरती… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on March 7, 2011 at 5:38pm — 2 Comments

मुक्तिका: बड़े नेता... संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:

बड़े नेता...



संजीव 'सलिल'

*
बड़े नेता.

सड़े नेता. .



मरघटों में

गड़े नेता..



स्वहित हेतु

अड़े नेता..



जड़, बिना जड़

जड़े नेता..…





Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on March 7, 2011 at 5:30pm — 3 Comments

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