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बृजेश नीरज's Blog – April 2013 Archive (7)

डमरू घनाक्षरी

नियम : ३२ वर्ण लघु बिना मात्रा के ८,८,८,८ पर यति प्रत्येक चरण में .

 

प्रणय पवन बह, रस मन बरसत

बढ़त लहर जस, तन मन गद गद

चमक दमक बस, चलत नगर घर

पग पग हर पल, रहत मदन मद

 

मन भ्रमर चलत, उड़त गगन तक

इत उत भटकत, उठत बहत रह

प्रणय ललक वश, बहकत सम्हरत

चरफर महकत, चटक मटक रह

                 - बृजेश नीरज

Added by बृजेश नीरज on April 26, 2013 at 10:25am — 10 Comments

नवगीत/ सांस अभी बाकी है

बस आस तुम्हारी बाकी है

इस आंख में आंसू बाकी है

 

जब जब झरनों सी तरूणाई

आ आकर फिर लौटी है

तुम बन करके शीत चुभन

याद तुम्हारी लौटी है

 

मीत मिले दिन…

Continue

Added by बृजेश नीरज on April 23, 2013 at 5:14pm — 19 Comments

घनाक्षरी

तोहरे दुआरे मात, खड़े दोउ कर जोरे,

अब तो आप आइके, दरस दिखाइए |

तोहरी शरण आया, तेरा ये कपूत मात,

सेवक को मां अपनी, शरण लगाइए |

इक आस तोरी मात, दूजा को सहाई मोर,

अइसे न आप मोरी, सुधि बिसराइए |…

Continue

Added by बृजेश नीरज on April 17, 2013 at 10:30pm — 14 Comments

वह सड़क बंद है

हर तरफ खौफनाक सन्नाटा

कहीं कोई आवाज नहीं

हालांकि दर्द हदों को छू गया।

 

जिंदगी

दरकने लगी है

तप रही है जमीन,

पानी की बूंद

गायब हो जाती…

Continue

Added by बृजेश नीरज on April 13, 2013 at 6:00pm — 26 Comments

गद्य काव्य

आधुनिक नई धारा हिन्दी साहित्य में कई नई विधाएं अपने साथ लेकर आयी। कई तरह के अभिनव प्रयोग हुए। इन्हीं विधाओं में से एक विधा है गद्य काव्य। इस विधा में त्रिलोचन शास्त्री ने बहुत काम किया।

मैंने एक गद्य काव्य लिखने का प्रयास किया है। मैं नहीं जानता कि मैं कितना सफल या असफल हुआ हूं। अपना यह प्रयास इस मंच पर इस आशय से प्रस्तुत कर रहा हूं कि इसके माध्यम से इस विधा पर कुछ चर्चा हो सके और मेरे साथ साथ सबको इस विधा के बारे में जानने का एक अवसर प्राप्त हो सके।

आशा है सुधी जन मुझे मार्गदर्शन… Continue

Added by बृजेश नीरज on April 9, 2013 at 6:59pm — 12 Comments

गज़ल/ एक प्रयास

2122,       2122,      2122,   2

भूख से बिल्ली परेशां जो रही होगी

रोटियां बासी तभी तो खा गयी होगी

 

हौसले परिंदों के भी तो पस्त होते हैं

लाख उड़ने की कला उनमें रही होगी

 

कोयलों की कूक गायब…

Continue

Added by बृजेश नीरज on April 5, 2013 at 6:20pm — 10 Comments

जागोगे तुम?

कुम्हार सो गया

थक गया होगा शायद

 

मिट़टी रौंदी जा रही है

रंग बदल गया

स्याह पड़ गयी

 

चाक घूम रहा है

समय चक्र की तरह…

Continue

Added by बृजेश नीरज on April 1, 2013 at 5:17pm — 26 Comments

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