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Anwar suhail's Blog – May 2013 Archive (6)

अद्भुत कला

अद्भुत कला है

बिना कुछ किये

दूजे के कामों को

खुद से किया बताकर

बटोरना वाहवाही...

जो लोग

महरूम हैं इस कला से

वो सिर्फ खटते रहते हैं

किसी बैल की तरह

किसी गधे की तरह

ऐसा मैं नही कहता

ये तो उनका कथन है

जो सिर्फ बजाकर गाल

दूसरों के कियेकामों को

अपना…

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Added by anwar suhail on May 26, 2013 at 7:49pm — 5 Comments

जिस वक्त कोई

जिस वक्त कोई

बना रहा होता क़ानून

कर रहा होता बहस

हमारी बेहतरी के लिए

हम छह सौ फिट गहरी

कोयला खदान के अंदर

काट रहे होते हैं कोयला

जिस वक्त कोई

तोड़ रहा होता क़ानून

धाराओं-उपधाराओं की उड़ा-कर धज्जियां

हम पसीने से चिपचिपाते

ढो रहे होते कोयला अपनी पीठ पर..

जिस वक्त कोई

कर रहा होता आंदोलन

व्यवस्था के खिलाफ लामबंद

राजधानियों की व्यस्ततम सड़कों पर

हम हाँफते- दम…

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Added by anwar suhail on May 22, 2013 at 8:20pm — 3 Comments

खनिकर्मी

कोयला खदान की

आँतों सी उलझी सुरंगों में

पसरा रहता अँधेरे का साम्राज्य



अधपचे भोजन से खनिकर्मी

इन सर्पीली आँतों में

भटकते रहते दिन-रात

चिपचिपे पसीने के साथ...



तम्बाकू और चूने को

हथेली पर मलते

एक-दूजे को खैनी खिलाते

सुरंगों में पिच-पिच थूकते

खानिकर्मी जिस भाषा में बात करते हैं

संभ्रांत समाज उस भाषा को

असंसदीय कहता, अश्लील कहता...



खदान का काम खत्म कर

सतह पर आते वक्त

पूछते अगली शिफ्ट के कामगारों से

ऊपर का…

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Added by anwar suhail on May 17, 2013 at 9:30pm — 8 Comments

सर झुकाना नहीं आता

क्या करें, 

इतनी मुश्किलें हैं फिर भी

उसकी महफ़िल में जाकर मुझको

गिडगिडाना नहीं   भाता.....

 

वो जो चापलूसों से घिरे रहता है

वो जो नित नए रंग-रूप धरता है

वो जो सिर्फ हुक्म दिया करता है

वो जो यातनाएँ दे के हंसता है

मैंने चुन ली हैं सजा की राहें

क्योंकि मुझको हर इक चौखट पे

सर झुकाना नहीं आता...

 

उसके दरबार में रौनक रहती

उसके चारों तरफ सिपाही हैं

हर कोई उसकी इक नज़र का मुरीद

उसके नज़दीक…

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Added by anwar suhail on May 7, 2013 at 8:21pm — 7 Comments

हम खुद ही बादशाह हैं

हम वो नही जो आपकी

चुटकी में मसल जाएँ

हम वो नहीं जो आपके

पैरों से कुचल जाएँ

हम वो नहीं जो आपके

डर से रण छोड़ जाएँ

हम वो नहीं जो आपकी

भभकी से सिहर जाएँ

 

जुल्मो-सितम की आंधी

यातनाओं के तूफ़ान में भी

देखो तने खड़े हम

किसी पहाड़ की तरह  

खुद्दारी और खुद-मुख्तारी

यही तो है पूंजी हमारी...

 

उन जालिमों के गुर्गे

टट्टू निरे भाड़े के

हथियार छीन लो तो

रण छोड़ भाग…

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Added by anwar suhail on May 4, 2013 at 8:21pm — 5 Comments

याद करो...

कैसे बन जाता कोई नपुंसक

कैसे हो जाती खामोश जुबान

कैसे हज़ारों सिर झुक जाते

कैसे बढते क़दम रुक जाते

 

कुंद कर दिया गया दिमाग

पथरा गई हैं संवेदनाएं

किसी साज़िश के तहत

खत्म कर दी गई हैं संभावनाएं

 

मैंने कहा साथी!

क्या हुआ कि बंद हैं राहें

गूँज रही हर-सू आहें-कराहें

क्या हुआ कि खो गई दिशाएँ

क्या हुआ कि रुक गई हवाएं

याद करो,

हमने खाई थी शपथ

विपरीत परिस्थितियों में

हम झुकेंगे…

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Added by anwar suhail on May 3, 2013 at 7:57pm — 9 Comments

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