कच्ची रोटी भी प्रेमिका की भली लगती है
बीबी अच्छी भी खिलाये तो जली लगती है |
बीबी हँस दे तो कलेजा ही दहल जाता है
प्रेयसी रूठी हुई भी तो भली लगती है |
नये - नये में बहु कितनी भली लगती है
फिर ससुर - सास को वो बाहुबली लगती है |
कलि अनार की लगती थी ब्याह से पहले
अब मैं कीड़ा हूँ और वो छिपकली लगती है |
फिर चुनी जायेगी दीवार में पहले की तरह
ये मोहब्बत सदा अनारकली लगती है |
इस शहर …
Added by अरुण कुमार निगम on June 26, 2012 at 9:14pm — 4 Comments
कविताओं में बाँचिये , शीतल मंद समीर
शब्दों में ही बह रहा , निर्मल निर्झर नीर
निर्मल निर्झर नीर,हरा वसुधा का आँचल…
Added by अरुण कुमार निगम on June 6, 2012 at 12:30am — 12 Comments
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