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SANDEEP KUMAR PATEL's Blog – June 2013 Archive (4)

ग़ज़ल

वेदियों सा तप्त मन अपने लिए

कर रहा सारे हवन अपने लिए



अपनेपन को छोड़ मतलब साधते

दोस्त का होता चयन अपने लिए



मूढ़ मन में मैल ले गंगा नहा

कर रहा है आचमन अपने लिए



तितलियों को हांक कर भंवरे कहें

फूल कलियाँ हैं चमन अपने लिए



देश की है फ़िक्र किस इंसान को

हर कहीं चिंतन मनन अपने लिए



हिंदियों की नाक ऊँची कर रहा

पश्चिमी का ला चलन अपने लिए



आँख दिखलाता है वो माँ बाप को

संस्कृति का कर हनन अपने लिए…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on June 30, 2013 at 10:30am — 6 Comments

अब तो कर दो बंद, लोगो प्रकृति का दोहन

दोहन करते प्रकृति का, बड़े बड़े विद्वान्

चला चला बस योजना, बनते खूब महान

बनते खूब महान , हरे जंगल कटवाते

दूषित कर परिवेश, कारखाने बनवाते

धरा बचाने आज, नहीं आने मनमोहन

अब तो कर दो बंद, लोगो प्रकृति का दोहन

 

संदीप पटेल “दीप”  

Added by SANDEEP KUMAR PATEL on June 5, 2013 at 5:55pm — 13 Comments

प्रगति के महल

आओ ज़रा शहर निहारें

चमचमाती सड़कों पर

चमचमाती कारें

ऊँचे ऊँचे दीप्ति खंभ

अँधेरे को पीते

बड़े बड़े लट्टू

रग रग में संचरित होता दंभ



सुन्दर बाग़

ये महल अटारी

मशीन भारी भारी

और कुछ बड़ी बीमारी



सब तन रहा है

गाँव गाँव

अब शहर जो बन रहा है

बढ़ रहा है

धीरे धीरे

अटारी पर अटारी

तानी जा रही हैं

जो प्रगति की निशानी 

मानी जा रही है 



बेशुध हुआ सा आदम

भागा जा रहा है

अरमानों के…

Continue

Added by SANDEEP KUMAR PATEL on June 5, 2013 at 1:00pm — 6 Comments

हे पथिक

एक अँधेरी गली

सुनसान

वीरान

पथिक व्यथित

हलाकान

 

न कोई

हलचल

न कोई

आवाज

न साज

पथिक व्यथित

उदास

 

गहन अँधेरा

कालिमा का बसेरा

ह्रदय के स्पंदन

स्वर में बदल रहे हैं

चीत्कार

स्वयं की

बस स्वयं की

 

वर्षों सुनसान

गली में

चलते चलते

स्वयं से

परिचर्चा करते करते

कभी थाम लेता था

हाथ

स्वयं का दिलासा…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on June 2, 2013 at 12:00pm — 21 Comments

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