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Sushil Sarna's Blog – July 2024 Archive (7)

दोहा सप्तक. . . . नेता

दोहा सप्तक. . . . नेता

संसद में लो शोर का, शुरू हुआ नव सत्र ।

आरोपों की फैलती, बौछारें सर्वत्र ।।

अपशब्दों से गूँजता, अब संसद का सत्र ।

परिणामों से पूर्व ही, फाड़े जाते पत्र ।।

पावन मन्दिर देश का, संसद होता मित्र ।

नेता लड़ कर देश का, धूमिल करते चित्र ।।

कितने ही वादे करें, नेता चाहे आज ।

नग्न नयन के स्वप्न तो, टूटें बिन आवाज । ।

संसद में नेता करें, बात -बात पर तर्क ।

जनता की हर आस का, होता बेड़ा गर्क ।।

नेताओं के पास कब ,…

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Added by Sushil Sarna on July 31, 2024 at 2:19pm — No Comments

दोहा पंचक . . . वक्त

दोहा पंचक. . . . वक्त

हर करवट में वक्त की,छिपी हुई है सीख ।

आ जाए जो वक्त तो, राजा मांगे भीख ।।

डर के रहना वक्त से, ये शूलों का ताज ।

इसकी लाठी तो सदा, होती बे-आवाज ।।

पल भर की देता नहीं, वक्त किसी को भीख ।

अन्तिम पल की वक्त में , गुम हो जाती चीख ।।

बिना वक्त मिलता नहीं, किस्मत का भी साथ ।

कभी पहुँच कर लक्ष्य पर , लौटें खाली हाथ ।।

सुख - दुख सब संसार में, रहें वक्त  आधीन  ।

काल पाश में  आदमी, लगता कितना दीन…

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Added by Sushil Sarna on July 29, 2024 at 1:30pm — 6 Comments

दोहा अष्टम. . . . प्रश्न

दोहा अष्टम ......प्रश्न

उत्तर   सारे   मौन   हैं,  प्रश्न   सभी   वाचाल ।

किसने जानी आज तक,भला काल की चाल ।।

यह   जीवन   तो   शून्य  का, आभासी है रूप ।

पग - पग पर संघर्ष की, फैली तीखी धूप ।।

तोड़ सको तो तोड़ दो, प्रश्नों का हर जाल ।

यह जीवन तो पूछता, हरदम नया सवाल ।।

हर मोड़ पर जिंदगी, पूछे एक सवाल ।

क्या पाने की होड़ में, जीवन दिया निकाल ।।

फिसला जाता रेत सा, जीवन जरा संभाल ।

क्या जानें किस मोड़ पर, मिले अचानक काल ।।

बहुतेरे…

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Added by Sushil Sarna on July 25, 2024 at 3:31pm — No Comments

दोहा पंचक. . . . मेघ

दोहा पंचक. . . . . मेघ

हाथ जोड़ विनती करे, हलधर बारम्बार।

धरती की जलधर सुनो, अब तो करुण पुकार।।

अवनी से क्यों रुष्ट हो, जलधर बोलो आज ।

हलधर बैठा सोच में, कैसे उगे  अनाज ।।

अम्बर के हर मेघ में, हलधर की है आस ।

बिन जलधर कैसे मिटे, तृषित धरा की प्यास ।।

सावन में अठखेलियाँ, नभ में करे पयोद ।

धरा तरसती वृष्टि को, मेघा करते मोद ।।

श्वेत हंस की टोलियाँ, नभ में उड़े स्वछंद ।

धूप - छाँव का हो रहा, ज्योँ आपस में द्वन्द्व…

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Added by Sushil Sarna on July 22, 2024 at 12:50pm — 2 Comments

दोहा पंचक. . . . . गिरगिट

दोहा पंचक. . . . . गिरगिट

बात- बात पर आदमी ,बदले रंग हजार ।

गिरगिट सोचे क्या करूँ, अब  इसका  उपचार ।।

गिरगिट माँगे ईश से, रंगों का अधिकार ।

लूट लिए इंसान ने, उसके रंग अपार ।।

गिरगिट तो संसार में, व्यर्थ हुई बदनाम ।

रंग बदलना आजकल, इंसानों का काम ।।

गिरगिट बदले रंग जब , भय का हो आभास।

मानव बदले रंग जब, छलना हो विश्वास ।।

शायद अब यह हो गया, गिरगिट को आभास ।

नहीं सुरक्षित आजकल, इंसानों में वास ।।

सुशील सरना /…

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Added by Sushil Sarna on July 16, 2024 at 8:30pm — 3 Comments

दोहा सप्तक .. इच्छा , कामना, चाह आदि

दोहा सप्तक : इच्छा ,कामना, चाह  आदि

मानव मन संसार में, इच्छाओं का दास ।

और -और की चाह में, निस-दिन बढ़ती प्यास ।1।

इच्छा हो जो बलवती, सध जाता हर काम ।

चर्चा  उसके नाम की, गूँजे आठों याम ।2।

व्यवधानों की लक्ष्य में, जो करते परवाह ।

क्षीण लगे उद्देश्य में, उनके मन की चाह ।3।

अन्तर्मन की कामना, छूने की आकाश ।

सम्भव है यह भी अगर, होवें नहीं हताश ।4।

परिलक्षित संसार में, होता वो परिणाम ।

इच्छा के अनुरूप…

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Added by Sushil Sarna on July 5, 2024 at 8:30pm — 8 Comments

दोहा एकादश. . . . जरा काल

दोहा एकादश. . . . जरा काल

दृग जल हाथों पर गिरा, टूटा हर अहसास ।

काया  ढलते ही लगा, सब कुछ था आभास ।।1

जीवन पीछे रह गया, छूट गए मधुमास ।

जर्जर काया क्या हुई, टूट गई हर  आस ।।2

लार गिरी परिधान पर, शोर हुआ घनघोर ।

काया पर चलता नहीं, जरा काल में जोर ।।3

लघु शंका बस में नहीं, थर- थर काँपे हाथ ।

जरा काल में खून ही , छोड़ चला फिर साथ ।।4

अपने स्वर्णिम काल को ,मुड़-मुड़ देखें नैन ।

जीवन फिसला रेत सा, काटे कटे न रैन ।।5

सूखा रहता…

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Added by Sushil Sarna on July 3, 2024 at 2:00pm — No Comments

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