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Savitamishra's Blog – August 2014 Archive (8)

सिसकियाँ (लघुकथा)

माँ सोनी के कमरे से खूब रोने चीखने की आवाजें आ रही थी, १४ साल की राधा भयभीत हो रसोई में दुबकी रही, जब तक पिता के बाहर जाने की आहट ना सुनी ! बाहर बने मंदिर से पिता हरी की दुर्गा स्तुति की ओजस्वी आवाज गूंजने लगी! भक्तों की "हरी महाराज की जय" के नारे से सोनी की सिसकियाँ दब गयी! पिता के बाहर जाते ही माँ से जा लिपट बोली "माँ क्यों सहती हो?" सोनी घर के मंदिर में बिराजमान सीता की मूर्ति देख मुस्करा दी! अपने घाव पर मलहम लगाते हुए बोली, "मेरा पति और तेरा पिता…

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Added by savitamishra on August 25, 2014 at 2:00pm — 20 Comments

गांधी नोट

अपनी आबरू बेच जब

हाथ में नोट आया

लड़की ने नोट पर

अंकित गांधी के चित्र पर

अपनी बेबस नजरों को गड़ाया

गांधी बहुत ही शर्मिंदा हुए

अपनी खुद की नजरों को

जमीं में गड़ता पाया

नहीं मिला पायें नजर

आंसुओं से डबडबाई नजरों से

देश के हालत पर चीत्कार से…

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Added by savitamishra on August 21, 2014 at 1:00pm — 24 Comments

दिल की सच्चाई

हे प्रभु, सुन !

कर दें अँधेरा

चारों तरफ.. .  

उजाले काटते हैं / छलते है !

लगता है अब डर

उजालें से

दिखती हैं जब

अपनी ही परछाई -

छोटी से बड़ी

बड़ी से विशालकाय होती हुई.

भयभीत हो जाती हूँ !

मेरी ही परछाई मुझे डंस न ले,

ख़त्म कर दे मेरा अस्तित्व !

जब होगा अँधेरा चारों ओर

नहीं दिखेगा

आदमी को आदमी !

यहाँ तक कि हाथ को हाथ भी.

फिर तो मन की आँखें

स्वतः खुल जाएँगी !

देख…

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Added by savitamishra on August 19, 2014 at 2:00pm — 20 Comments

'संस्कार' कहानी

सुमन बदहवास सी घटना स्थल पर पहुंची, अपने बेटे प्रणव की हालत देख बिलखने लगी| भीड़ की खुसफुस सुन वह सन्न सी रह गयी, एक नवयुवती की आवाज सुमन को तीर सी जा चुभी "लड़की छेड़ रहा था उसके भाई ने कितना मारा, कैसा जमाना आ गया ......|" "अरे नहीं, 'भाई नहीं थे', देखो वह लड़की अब भी खड़ी हो सुबक रही है" बगल में खड़ी बुजुर्ग महिला बोली  ....यह सुन सुमन का खून खौल उठा,  और शर्म से नजरें नीची हो गयी| प्रणव पर ही बरस पड़ी "तुझे क्या ऐसे 'संस्कार' दिए थे हमने करमजले, अच्छा हुआ जो तेरे बहन नहीं है| प्राण ..."मम्मी…

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Added by savitamishra on August 16, 2014 at 12:00am — 22 Comments

बलिदानी.....तुकांत कविता

देख तेरे देश की हालत क्या हो गयी बलिदानी

कितना बदल गया है यहाँ हर एक हिन्दुस्तानी|



की क्यों तुने स्वदेश पर मर मिटने की नादानी

अपनों में ही खोया यहाँ हर एक हिन्दुस्तानी|



की क्यों तुने स्वदेश पर मर मिटने की नादानी

अपनों में ही खोया यहाँ हर एक…

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Added by savitamishra on August 13, 2014 at 8:00pm — 9 Comments

स्व रक्षार्थ का भार भेजा है (तुकांत कविता )

रक्षा सूत्र में पिरोकर अपना प्यार भेजा है

भैया तुझे मैंने स्व रक्षार्थ का भार भेजा है|



माना मन में तेरे राखी का सम्मान नहीं  

बड़े मान से हमने अपना दुलार भेजा है|



रिश्ता भाई बहन  का हैं एक अटूट बंधन

होता  जार जार जो सब जोरजार भेजा है|



ढुलक गया मोती जो मेरी नम आँखों से

 पिरोकर मोती  हमने उपहार भेजा है|



गिले शिकवे भूल सारे फिर एक बार

  सहेज कर यादें लिफ़ाफ़े में मधुर भेजा है|



राखी दो पैसे की हो  या हजारों की भैया…

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Added by savitamishra on August 7, 2014 at 11:00am — 7 Comments

अतुकांत कविता .....प्रवृत्ति.....

एक ही सिक्के के दो पहलू होते हैं सुख-दुःख,

फिर क्यों लगता है -

-सापेक्ष सुख के नहले पर दहला सा दुःख ?

- सुख मानो ऊंट के मुहं में जीरा-सा ?

आखिर क्यों नहीं हम रख पाते निरपेक्ष भाव ?



प्यार-नफ़रत तो हैं सामान्य मानवी प्रवृत्ति !

फिर भी -

प्यार पर नफ़रत लगती सेर पर सवा सेर ,

प्यार कितना भी मिले दाल में नमक-सा लगता !

थोड़ी भी नफ़रत पहाड़ सी क्यों दिखती है आखिर ?



होते हैं…

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Added by savitamishra on August 5, 2014 at 10:01am — 38 Comments

चोका

मेघ निबह

श्याम श्वेत निर्मोही

भ्रम फैलाये

उड़ती घटा छाये

सूर्य आछन्न

दुविधा में फंसाए

काम बढाए

अकस्मात बरखा

बाहर डाले

कपड़े निकालते

फिर डालते

गृहलक्ष्मी दुचित्ता

क्रोध बढ़ाए

उलझौआ पयोद

वक्त कीमती

दुरुपयोग होता

वक्त भागता

सुना था कभी कही

खुद पे बीती

खीझ दुघडिया पे

भुनभुनाती

काम है निपटाने

प्रावृट् बदरा

तुझे सूझे नौटंकी

घुंघट ओढ़

हुई तू तो बावरी|

तंग गृहणी

मेघ निरंग निस्तारा

भ्रान्ति…

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Added by savitamishra on August 4, 2014 at 12:21pm — 19 Comments

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