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गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s Blog – August 2020 Archive (4)

आती है जब शमीम-ए-सदाक़त ज़बान से(१२२ )

( 221 2121 1221 212 )
आती है जब शमीम-ए-सदाक़त ज़बान से
तो क्यों चले न हम जहाँ में यार शान से
जैसे बदलती रुख़ है सबा अपना यक ब यक
वैसे कभी पलटते नहीं हम बयान से
कार-ए-जियाँ में कट रही कैसे है ज़िंदगी
पूछेगा दर्द कौन किसी नौ-जवान से
मेरी सलामती है सुबूत-ए-शिक़स्त-ए-ज़ुल्म
ख़ाली गया है तीर जो निकला कमान…
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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on August 31, 2020 at 7:00pm — 6 Comments

तमाम उम्र किया मैंने इन्तिज़ार तेरा (१२१ )

(1212 1122 1212 22 /112 )
तमाम उम्र किया मैंने इन्तिज़ार तेरा
नहीं रहा कभी मुमकिन भुलाना प्यार तेरा
**
न तेरी आहटों का सिलसिला रुका था कभी
हवाएँ करती रहीं ज़िक्र बार बार तेरा
**
सजा रखीं हैं करीने से दिल में यादें तेरी

कि दिल की धड़कनों पे अब भी इख़्तियार तेरा

**

अगरचे तुझ से मुलाक़ात अब है ना-मुमकिन

मगर है…
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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on August 30, 2020 at 4:00pm — 8 Comments

मुहब्बत की ज़मीँ देकर यक़ीं का आसमाँ दे दो (१२० )

( 1222 1222 1222 1222 )

मुहब्बत की ज़मीँ देकर यक़ीं का आसमाँ दे दो

रहोगे सिर्फ़ मेरे तुम मुझे बस यह ज़बाँ दे दो

न रक्खो चीज़ कोई तुम तअल्लुक़ जिसका ग़म से है

तुम्हारी सिसकियाँ आहें कराहें और फुगाँ दे दो

परख लें एक दूजे को किसी कोने में रह लूंगा

मुझे कुछ दिन किराये पर सनम दिल का मकाँ दे दो

मुहब्बत में नफ़'अ-नुक़्सान की परवाह किसको है

चलो रक्खो तुम्हीं सब फ़ायदा मुझको ज़ियाँ दे दो

मेरे जज़्बात की कुछ क़द्र करना सीख लो हमदम

मेरी परवाज़-ए-उल्फ़त को खुला तुम…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on August 28, 2020 at 5:30pm — 7 Comments

वक़्त ने हमसे मुसल्सल इस तरह की रंजिशें (११९ )

एक ग़ैर मुरद्दफ़ ग़ज़ल 

(2122 2122 2122 212 )

वक़्त ने हमसे मुसल्सल इस तरह की रंजिशें

ख़ुदक़ुशी को हो गईं मज़बूर अपनी ख़्वाहिशें

अजनबी जो भी मिले सारे मुहब्बत से मिले

और की हैं ख़ास अपनों ने हमेशा साज़िशें

क्या ख़ुदा नाराज़ है कुछ आदमी से इन दिनों

गर्मियोँ के बाद आईं थोक में हैं बारिशें

क्यों नुज़ूमी को दिखाता हाथ है तू बार बार

क्या लकीरें हाथ की रोकेंगीं तेरी…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on August 4, 2020 at 9:30pm — 6 Comments

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