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Featured Blog Posts – September 2012 Archive (8)

हम हो न सकते नीलकंठ

व्योमकेश !

हम हो न

सकते नीलकंठ ....

 गरल कर

धारण स्वयम

तुमने उबारा

संसृति को 

अमिय देवों

ने पिया

झुकना पड़ा

आसुरी प्रकृति को

थम गया

तव कंठ में ही

सृष्टि का विध्वंस

हम हो न सकते ....

साक्षी थे

तुम भी तो

विकराल मंथन के

सर्प सम संतति

समूची

तुम ही चन्दन थे

विष तुम्हें डंसता नहीं

देता हमें शत दंश

व्योमकेश!

हम हो न सकते......

दृष्टि तेजोमय तुम्हारी …

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Added by Vinita Shukla on September 20, 2012 at 11:00pm — 19 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- २८

जिन्दगी थोड़ी बाकी थीकि गुज़र गई

नदी समन्दर के पास आकर मर गई

 

रात आईतो इमरोज़ किधर चला गया

दिन निकला तो लंबी रात किधर गई

 

आज यूँ अकेला हूँ मैं अपनों के बीच

इक भीड़ में मेरी तन्हाई भी घर गई

 

दरोदीवार पुतगए बरसातकी सीलनसे

अबके बरस छत की कलई उतर गई

 

जो लोग तेज थे उठा लेगए सब ईंटें

दीवार खामोश अपने कदसे उतर गई  

 

हवाओंने गिराए जो पके फल धम्मसे

इक अकेली चिड़िया शाख पे डर गई…

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Added by राज़ नवादवी on September 17, 2012 at 11:43pm — 18 Comments

गीत मे तू मीत मधुरिम नेह के आखर मिला

सौरभ जी से चर्चा के पश्चात जो परिवर्तन किये हैं उन्हें प्रस्तुत कर रही हूँ 

परिचर्चा के बिंदु सुरक्षित रह सके  इस हेतु  पूर्व की पंक्तियों को भी डिलीट नहीं किया है जिससे नयी पंक्तियाँ नीले text में हैं 

 

गीत मे तू मीत मधुरिम नेह के आखर मिला 

प्रीत के मुकुलित सुमन हो भाव मे भास्वर* मिला -----*सूर्य



हो सकल यह विश्व ही जिसके लिए परिवार सम 

नीर मे उसके नयन के स्नेह का सागर मिला …



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Added by seema agrawal on September 12, 2012 at 10:00am — 34 Comments

मिलन की बात है असंभव

तुम कंचन हो,

मै कालिख हूँ!

तुम पारस, मै

कंकड़ इक हूँ!

 

तुम सरिता हो,

मै कूप रहा!

तुम रूपा, इत

ना रूप रहा!

जो मानव नहीं है उसको, देव की पांत है असंभव!

है तुलना न अपनी कोई, मिलन की बात है असंभव!

 तुम ज्वाला हो,

मै…

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Added by पीयूष द्विवेदी भारत on September 11, 2012 at 2:30pm — 58 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
दोहे – कालजयी साहित्य

मान और सम्मान की,नहीं कलम को भूख

महक  मिटे  ना पुष्प  की , चाहे जाये सूख |

 

खानपान  जीवित  रखे , अधर रचाये पान

जहाँ  डूब कान्हा मिले , ढूँढो वह रस खान |…

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Added by अरुण कुमार निगम on September 11, 2012 at 12:00am — 14 Comments

ग़ज़ल - बचा है अब यही इक रास्ता क्या

दोस्तों, ग़ज़ल पेश ए खिदमत है गौर फरमाएं ..



बचा है अब यही इक रास्ता क्या

मुझे भी भेज दोगे करबला क्या



तराजू ले के कल आया था बन्दर

तुम्हारा मस्अला हल हो गया क्या…



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Added by वीनस केसरी on September 9, 2012 at 2:30am — 13 Comments

मानस के रचनाकार में भी पुरुष अहम् भारी .

 [listen on shikhakaushik06  ]
 

Stamp on Tulsidas

सात कांड में रची तुलसी ने ' मानस ' ;

आठवाँ लिखने का क्यों कर न सके साहस ?



आठवे में लिखा जाता सिया का विद्रोह ;

पर त्यागते कैसे श्री राम यश का मोह ?



लिखते…

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Added by shikha kaushik on September 4, 2012 at 3:00pm — 15 Comments

"ज़मीं"

ये कहाँ खो गई इशरतों की ज़मीं;

मेरी मासूम सी ख़ाहिशों की ज़मीं; (१)



फिर कहानी सुनाओ वही मुझको माँ,

चाँद की रौशनी, बादलों की ज़मीं; (२)



वक़्त की मार ने सब भुला ही दिया,

आसमां ख़ाब का, हसरतों की ज़मीं; (३)



जुगनुओं-तितलियों को मैं ढूंढूं कहाँ,

शह्र ही खा गए जंगलों की ज़मीं; (४)



दौड़ती-भागती ज़िंदगी में कभी,

है मुयस्सर कहाँ, फ़ुर्सतों की ज़मीं; (५)



गेंहू-चावल उगाती थी पहले कभी,

बन गई आज ये असलहों…

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Added by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on September 3, 2012 at 3:00am — 32 Comments

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