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शिज्जु "शकूर"'s Blog – September 2014 Archive (2)

मजदूर

ये गाथा मजदूर की, जिसके नाना रूप।

पत्थर तोड़े हाथ से, बारिश हो या धूप।।

 

कड़ी धूप में पिस रही, रोटी की ले आस।

पानी की दो घूँट से, बुझा रही है प्यास।।

 

सर पर ईंटें पीठ पर, लादे अपना लाल।

मानवता कुछ ढूँढती, लेकर कई सवाल।।

 

वे भी जन इस देश के, करते हैं निर्माण।

पर खुद जीने के लिये, झोंके अपने प्राण।।

 

उनको हो सबकी तरह, जीने का अधिकार।

उनके कर्मठ हाथ हैं, विकास का आधार

-मौलिक व…

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Added by शिज्जु "शकूर" on September 27, 2014 at 8:04am — 10 Comments

हर सम्त आस पास गुलिस्तान बन गये- ग़ज़ल

221 2121 1221 212

हर सम्त आस पास गुलिस्तान बन गये

ये माहो शम्स गुल मेरी पहचान बन गये

 

जो लोग शह्र फूँक के नादान बन गये

बदकिस्मती से आज निगहबान  बन गये

 

आँखों में धूल झोंक के लोगों की देख लो

मतलब परस्त मुल्क के सुल्तान बन गये

 

चमके तो मेह्र बन गये जो आसमान की

वो आँखों में उतरते ही अरमान बन गये

 

जिनकी ज़बाँ उगलती रही ज़ह्र अब तलक

कैसे ये मान लूँ कि वो इंसान बन गये

 

सूरत बदल गई…

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Added by शिज्जु "शकूर" on September 25, 2014 at 7:54am — 20 Comments

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