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रमेश कुमार चौहान's Blog – September 2016 Archive (4)

चवपैया छंद

(चवपैया छंद-10, 8, 12 मात्रा के तीन -तीन चरणों के कुल चार पद , प्रत्येक पद के प्रथम एवं द्वितीय चरण मं समतुक एवं दो-दो पद में 1122 मात्रा या पदांत 2 मात्रा के के साथ समतुक पर हो)

हे आदि भवानी, जग कल्याणी, जन मन के हितकारी ।
माँ तेरी ममता, सब पर समता, जन मन को अति प्यारी ।।
हे पाप नाशनी, दुख विनाशनी, जग से पीर हरो माँ ।
आतंकी दानव, है क्यों मानव, जन-मन विमल करो माँ ।।

...................................

मौलिक अप्रकाशित

Added by रमेश कुमार चौहान on September 25, 2016 at 7:30am — 2 Comments

भाषा यह हिन्द (त्रिभंगी छंद)

भाषा यह हिन्दी, बनकर बिन्दी, भारत माँ के, माथ भरे ।
जन-मन की आशा, हिन्दी भाषा, जाति धर्म को, एक करे ।।
कोयल की बानी, देव जुबानी, संस्कृत तनया, पूज्य बने ।
क्यों पर्व मनायें,क्यों न बतायें, हिन्दी निशदिन, कंठ सने ।।

Added by रमेश कुमार चौहान on September 14, 2016 at 12:00pm — 5 Comments

सावन सूखी रह गई

सावन

सूखी रह गई,

सूखे भादो मास

विरहन प्यासी धरती कब से,

पथ तक कर हार गई

पनघट पूछे बाँह पसारे,

बदरा क्यों मार गई

पनिहारिन

भी पोछती

अपनी अंजन-सार

रक्त तप्त अभिसप्त गगन यह,

निगल रहे फसलों को

बूँद-बूँद कर जल को निगले,

क्या दें हम नसलों को

धूँ-धूँ कर

अब जल रही

हम सबकी अँकवार

कब तक रूठी रहेगी हमसे,

अपना मुँह यूॅं फेरे

हम तो तेरे द्वार खड़े हैं

हृदय हाथ में…

Continue

Added by रमेश कुमार चौहान on September 14, 2016 at 11:27am — 3 Comments

गांव बने तब एक निराला

सौंधी सौंधी मिट्टी महके

चीं-चीं चिड़िया अम्बर चहके ।

बाँह भरे हैं जब धरा गगन

बरगद पीपल जब हुये मगन

गांव बने तब एक निराला

देख जिसे ईश्वर भी बहके ।

ऊँची कोठी एक न दिखते

पगडंडी पर कोल न लिखते

है अमराई ताल तलैया,

गोता खातीं जिसमें अहके ।

शोर शराबा जहां नही है

बतरावनि ही एक सही है

चाचा-चाची भइया-भाभी

केवल नातेदारी गमके ।

सुन-सुन कर यह गाथा

झूका रहे नवाचर माथा

चाहे  कहे…

Continue

Added by रमेश कुमार चौहान on September 12, 2016 at 10:00pm — 4 Comments

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