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Sheikh Shahzad Usmani's Blog – September 2016 Archive (6)

परीक्षा सिर पर (लघुकथा) / (हिन्दी पखवाड़े पर) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

कक्षा दसवीं के छात्रों को कुछ अंग्रेज़ी शब्दों के बनने का इतिहास और उनके सही मानक उच्चारण बताते हुए अंग्रेज़ी के शिक्षक कहने लगे- "इसलिए मैं कहता हूँ कि कोई दम नहीं है अंग्रेज़ी भाषा में, विश्व की दूसरी भाषाओं के शब्दों से कभी उलझती, कभी संवरती सी बड़ी ही वाहियात भाषा है ये!" भावावेश में इतना कहकर वे छात्रों को अंग्रेज़ी के स्वर व व्यञ्जनों, उनसे शब्द-निर्माण और सही उच्चारण आदि का विस्तृत ज्ञान देते हुए छात्रों से सही उच्चारण का अभ्यास कराने लगे। छात्र असफल रहे, तो अपना सिर पीटते हुए छात्रों से… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on September 15, 2016 at 8:21pm — 3 Comments

बिज़नेस का सबक़ (लघुकथा)

"बेटा, ये सब सिर्फ़ उनका बिज़नेस है, कोई समर कैम्प चलाकर पैसा कमाता है, तो कोई हॉबी क्लासेज़! ढंग से कोई कुछ नहीं सिखाता!" - गर्मियों की छुट्टियां शुरू होने पर वर्मा जी ने अपने बेटे अतुल की फ़रमाइश पर समझाते हुए कहा।





"पापा, फिर स्कूल क्यों भेजते हो, वहां भी तो हमें कुछ भी नहीं सिखाते ढंग से!" अतुल ने जवाब में सवाल किया।



"किसने कहा तुमसे ऐसा?" वर्मा जी ग़ुस्से में बोले।



"ट्यूशन वाले सर ने ! दादा जी भी तो कहते हैं कि सालों ने बिज़नेस बना रखा है! क़िताबें थोप… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on September 13, 2016 at 4:17pm — 7 Comments

मसाला तो है ही नहीं! (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

स्मार्ट फोन के पटल (स्क्रीन) पर सोशल साइट की एक तस्वीर को देखकर रोहित ने अपने मित्र विशाल से कहा- "यह चित्र किसी फ़िल्म का हो, या सच्ची घटना का, तुम तो यह बताओ कि बीच सड़क पर बिखरे हुए काग़ज़ों व दस्तावेज़ों के बीच अकेला ये कौन बैठा हुआ है? अभागा या अभागिन? शोषित या शोषिता?"



"इसकी वेशभूषा, बैठने के अंदाज़ और घुटनों पर कसी हुई मांसपेशियों वाली भुजाओं की मुद्रा देखकर तो यह कोई दृढ़ संकल्पित, आंदोलित, कुछ परेशान सा युवक लग रहा है!"- विशाल ने उत्तर दिया।



"युवक नहीं, युवती है यार!… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on September 9, 2016 at 5:31am — 2 Comments

एक देश (अतुकांत कविता)/ शेख़ शहज़ाद उस्मानी

अपनों से ही जुदा

अपनों से ही लुटता

बहुचर्चित एक देश।



एक देश का ग़ुलाम

हथियार पाकर है बदनाम

ख़ुद बेलगाम एक देश।



ख़ुद को ख़ुद से भुलाता

मज़हब की आड़ लेता

कट्टरों का ग़ुलाम एक देश।



आतंक की ले पहचान

आतंक की खुली दुकान

पलता, पालता एक देश।



एक देश का है टुकड़ा

'आधा' खाकर, 'आधे' पर अकड़ा

छोटे से छोटा होता एक देश।



**



[2]



अपनों से ही संवरता

अपनों को ही उलझाता

बहुचर्चित… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on September 5, 2016 at 11:45pm — 10 Comments

दीवारें और भरोसे के ताले (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

'भरोसे' पर चल रही चर्चा के तहत सोशल साइट पर टिप्पणियों को पढ़कर कपिल ने रंजन से कहा- "पहले दीवारें छोटी होतीं थीं, लेकिन पर्दा होता था....ताले की ईजाद से पहले सिर्फ भरोसा होता था, मेरे दोस्त!"



रंजन ने प्रत्युत्तर में कहा- "हाँ, पर अब, दीवारें बड़ी हैं, पारदर्शी हैं। घर में सब कुछ भले नकली हो, पर ताला ज़रूर असली है।"



"असली है, पर क्या भरोसे का है?" कपिल ने पूछा।



"किसकी बात कर रहे हो, ताले की ही या धार्मिक बंधन और परम्परा, रिवाज़ों के बंधन की भी!" -रंजन ने कुछ… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on September 4, 2016 at 2:28pm — 3 Comments

पागल या बदनसीब (लघुकथा) / शेख़ शहज़ाद उस्मानी

व्यस्त मुख्य सड़क पर भारी वाहनों की आवा-जाही के बीच साइकिलों पर सवार विद्यालयीन छात्रायें बातचीत करती हुईं अपने विद्यालय की ओर जा रही थीं। उसी दिशा में जा रहे स्कूटर पर सवार एक शिक्षक ने अपने वाहन की गति धीमी करके दो छात्राओं को समझाने की कोशिश करते हुए कहा-"भारी ट्रक आ-जा रहे हैं, बातें करते हुए साइकल मत चलाईये!" - इतना कहा ही था कि पीछे से एक कार ने शिक्षक के स्कूटर को यूं टक्कर मारी कि वह उछलकर गिर पड़ा और वाहन दूसरी ओर बहक गया।



दोनों छात्राओं में से एक ने पीछे मुड़ कर देखा और… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on September 2, 2016 at 1:45am — 7 Comments

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