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Featured Blog Posts – October 2014 Archive (6)


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ग़ज़ल - इससे बढ़कर कोई अनर्गल क्या ? // --सौरभ

२१२२  १२१२  २२



इससे बढ़कर कोई अनर्गल क्या ?

पूछिये निर्झरों से - "अविरल क्या ?"



घुल रहा है वजूद तिल-तिल कर

हो रहा है हमें ये अव्वल क्या ?



गीत ग़ज़लें रुबाइयाँ.. मेरी ?

बस तुम्हें पढ़ रहा हूँ, कौशल क्या ?



अब उठो.. चढ़ गया है दिन कितना..

टाट लगने लगा है मखमल क्या !



मित्रता है अगर सरोवर से

छोड़िये सोचते हैं बादल क्या !



अब नये-से-नये ठिकाने हैं..

राजधानी चलें !.. ये चंबल क्या ?



चुप न…

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Added by Saurabh Pandey on October 25, 2014 at 12:00pm — 40 Comments

ग़ज़ल (अय्यूब खान "बिस्मिल")

कर दिया आम मिरे इश्क़ का चर्चा देखो

देखो ज़ालिम कि मुहब्बत का तरीक़ा देखो

याद करना कि मिरे दर्द कि शिद्दत क्या थी

खुद को ज़र्रों में कभी तुम जो बिखरता देखो

खूं तमन्ना का मुसलसल यहाँ बहता है अब

मेरी आँखों में है इक दर्द का दरिया देखो

यूँ सुना है कि वो नादिम है जफ़ा पे अपनी

उसके चेहरे पे जफाओं का पसीना देखो

अपने हाथों से सजाके में करूँगा रुखसत

कर लिया है मेने पत्थर का कलेजा देखो

ये हिना सुर्ख ज़रा…

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Added by Ayub Khan "BismiL" on October 23, 2014 at 3:00pm — 7 Comments

दिल्ली चीखती है

किसी की सरफ़रोशी चीखती है

वतन की आज मिट्टी चीखती है



हक़ीक़त से तो मैं नज़रें चुरा लूँ

मगर ख़्वाबों में दिल्ली चीखती है



हुकूमत कब तलक ग़ाफिल रहेगी

कोई गुमनाम बस्ती चीखती है



भुला पाती नहीं लख्ते-जिगर को

कि रातों में भी अम्मी चीखती है



बहारों ने चमन लूटा है ऐसे

मेरे आंगन में तितली चीखती है



गरीबी आज भी भूखी ही सोई

मेरी थाली में रोटी चीखती है



महज़ अल्फ़ाज़ मत समझो इन्हें तुम

हरेक पन्ने पे स्याही चीखती…

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Added by Samir Parimal on October 21, 2014 at 4:30pm — 13 Comments

मैं गीतों को भी अब ग़ज़ल लिख रहा हूँ (डॉ. राकेश जोशी)

मैं गीतों को भी अब ग़ज़ल लिख रहा हूँ
हरेक फूल को मैं कँवल लिख रहा हूँ

कभी आज पर ही यकीं था मुझे भी
मगर आज को अब मैं कल लिख रहा हूँ

बहुत कीमती हैं ये आँसू तुम्हारे
तभी आँसुओं को मैं जल लिख रहा हूँ

लिखा है बहुत ही कठिन ज़िंदगी ने
तभी आजकल मैं सरल लिख रहा हूँ

समय चल रहा है मैं तन्हा खड़ा हूँ
सदियाँ गँवाकर मैं पल लिख रहा हूँ

मैं बदला हूँ इतना कि अब हर जगह पर
तू भी तो थोड़ा बदल लिख रहा हूँ

"मौलिक व अप्रकाशित"

Added by Dr. Rakesh Joshi on October 19, 2014 at 5:30pm — 6 Comments


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मैं जीवन रंगोली-रंगोली सजा लूँ (डॉ० प्राची)

तुम मुस्कुराहट के

दीपक जलाओ

मैं जीवन रंगोली-रंगोली सजा लूँ

....चलो आज मैं भी दीवाली मना लूँ

 

माटी बनूँ ! रूँध लो, गूँथ लो तुम

युति चाक मढ़ दो, नवल रूप दो तुम

स्वर्णिम अगन से

जले प्राण बाती-

मैं स्वप्निल सितारे लिये जगमगा लूँ

....चलो आज मैं भी दीवाली मना लूँ

 

ओढूँ विभा सप्तरंगी…

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Added by Dr.Prachi Singh on October 19, 2014 at 12:00pm — 12 Comments

लघुकथा : आस्तीन

"अरे, बड़ा अजीब सा नाम लगा इस बंगले का, आस्तीन भी कोई नाम है !" शहर में नए आये व्यक्ति ने दोस्त से पूछा !

"जी, ये बंगला जिन्होंने बनवाया वो अब वृद्धाश्रम में रहते हैं !"

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by Neeles Sharma on October 16, 2014 at 7:00pm — 13 Comments

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