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Dr.Prachi Singh's Blog – November 2013 Archive (3)

सृजन-सृजन (अतुकांत) ...............डॉ० प्राची

शब्द तरंगहीन 

      गहनतम 

      सान्द्रतम 

      और 

      निर्बाध उन्मुक्तता में अवस्थित

      विलगता-विलयन के 

      सुलझे तारों पर स्पंदित

मन का अंतर्गुन्जन... / मदमस्त

जब चुन बैठे कोई स्वप्न 

और 

नियति 

चरितार्थ करने को हो बाध्य !

तब,

विधि विधान…

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Added by Dr.Prachi Singh on November 27, 2013 at 3:00pm — 34 Comments

गूँजी फिजाएं ......................डॉ० प्राची

वर्जना के टूटते

प्रतिबन्ध नें- 

उन्मुक्त, भावों को किया जब, 

खिल उठीं

अस्तित्व की कलियाँ 

सुरभि चहुँ ओर फ़ैली, 

मन विहँस गाने लगा मल्हार...

...फिर गूँजी फिजाएं …

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Added by Dr.Prachi Singh on November 21, 2013 at 4:30pm — 41 Comments

'तुम' ...................डॉ० प्राची

देश काल निमित्त की सीमाओं में जकड़े तुम 

और तुम्हारे भीतर एक चिरमुक्त 'तुम'

-जिसे पहचानते हो तुम !

उस 'तुम' नें जीना चाहा है सदा 

एक अभिन्न को-

खामोश मन मंथन की गहराइयों में 

चिंतन की सर्वोच्च ऊचाइंयों में 

पराचेतन की दिव्यता में.....

पूर्णत्वाकांक्षी तुम के आवरण में आबद्ध 'तुम'

क्या पहचान भी पाओगे 

अभिन्न उन्मुक्त अव्यक्त को-

एक सदेह व्यक्त प्रारूप में......?

(मौलिक और…

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Added by Dr.Prachi Singh on November 11, 2013 at 2:30pm — 39 Comments

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