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Amod Kumar Srivastava's Blog (49)

सोचा न था..

यूँ तो तक़दीर ने देखे हैं मोड़ कई ...

जिंदगी यूँ ही मुड़ेगी कभी सोचा न था..

कई ज़माने से  प्यासा हूँ में यहाँ ..

ओस से प्यास बुझेगी कभी सोचा न था..

यूँ तो फिरते हैं कई लोग यहाँ ..

गुदड़ी में लाल मिलेगा कभी सोचा न था ..

किस्मत ने दी है हर जगह दगा ..

मुकद्दर यूँ ही चमकेगा कभी सोचा न था ..

खून करे हैं सभी के अरमानों के हमने..

खून मेरा भी होगा कभी सोचा न था..…

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Added by Amod Kumar Srivastava on June 13, 2013 at 10:35am — 6 Comments

डायरी

आज बहुत पुरानी डायरी पर ...

उंगलियाँ चलाईं ...

जाने कहाँ से एक आवाज ..

चली आयी ..

आवाज, जानी पहचानी ...

कुछ बरसों पुरानी ..

एक हंसी,

जो दूर से हंसी जा रही थी..…

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Added by Amod Kumar Srivastava on June 12, 2013 at 4:00pm — 6 Comments

कौन...??

दोस्तों को दुश्मन बनाया है किसने ..

शमशान में लाशों को पहुँचाया है किसने..



किसने किसको, किसको है देखा ..

न देखा है हमने न, देखा है तुमने...



हुयी शाम और ये रात है आयी..

किसने ये तारों की महफ़िल सजाई ...



सोचते-सोचते में सो गया हूँ ..

रात की कालिमा में मैं खो गया हूँ..



किसने इस कालिमा को लालिमा बनाया ..

किसने मुझको फिर से जगाया..



किसने किसको, किसको है देखा ..

न देखा है हमने न, देखा है तुमने... …

Continue

Added by Amod Kumar Srivastava on June 10, 2013 at 12:00pm — 8 Comments

जिंदगी

जिंदगी

दर्द है या गम,

कि है नीरस सावन,

या कागज कोरा..

जाती हुयी शाम को ..

आती हुयी रात को ..

खिलखिलाती वो हंसी को,

पंक्षियों के कोलाहल को...

उसको है…

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Added by Amod Kumar Srivastava on May 27, 2013 at 4:30pm — 7 Comments

दरख्त

जाओ तुमको तुम्हारे हाल पे

मेने छोड़ दिया

तुमको इससे ज्यादा में और

दे भी क्या सकता था ...

देखो इस सूखे दरख्त को जिसने

बहुत फल खिलाये थे .. पर…

आज यहाँ परिंदा भी अपना

घोसला नहीं बनाता…

Continue

Added by Amod Kumar Srivastava on May 9, 2013 at 12:08pm — 6 Comments

मिमांस

दुखी सभी हैं यहाँ अपने अपने सुख के लिए..

तेरे लिए तो न कोई भी रोने वाला है ..

हजारों लोग इधर से गुज़र गए फिर भी ...

ये सिलसिला न कभी बंद होने वाला है..…

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Added by Amod Kumar Srivastava on April 9, 2013 at 11:30am — 2 Comments

लम्बे दिन

याद है ....

पहले की दिन कितने

बड़े होते थे

अम्मा तीन बार जगाती थी..

तब कहीं ७(सात) बजा करते थे..

नाश्ता करके ..

उछलते हुए स्कूल जाना

रास्ते में ठेले से केले खींचकर खान

आधी छुट्टी में स्कूल के बाहर

खड़े ठेले से चाट खाना ...

छुट्टी होते ही दोड़ते हुए

घर की तरफ भागना ...

कितना मज़ा था ...

उन दिनों का ..

अम्मा का दौड़ा .. दौड़ा कर खाना खिलाना ..

और समय होता था बस दोपहर का २(दो)

वाकई पहले के दिन कितने

बड़े होते थे… Continue

Added by Amod Kumar Srivastava on March 29, 2013 at 5:03pm — 6 Comments

"बैठक"

याद है

वो अपना दो कमरे का घर

जो दिन में

पहला वाला कमरा

बन जाता था

बैठक !!

बड़े करीने से लगा होता था

तख्ता, लकड़ी वाली कुर्सी

और टूटे हुए स्टूल पर रखा…

Continue

Added by Amod Kumar Srivastava on March 22, 2013 at 4:30pm — 4 Comments

अनाम रिश्ते

कुछ रिश्ते अनाम होते हें

बन जाते हें

यूँ हीं, बेवजह, बिना समझे

बिना देखे, बिना मिले ....

महसूस कर लेते हें एकदूजे को

जैसे हवा महसूस कर ले खुशबु को

मानो मन महसूस कर ले आरजू को

मानो रूह महसूस कर ले बदन…

Continue

Added by Amod Kumar Srivastava on March 20, 2013 at 2:00pm — 7 Comments

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