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Aazi Tamaam's Blog (24)

नग़मा: इक रोज़ लहू जम जायेगा इक रोज़ क़लम थम जायेगी

22 22 22 22 22 22 22 22

इक रोज़ लहू जम जायेगा इक रोज़ क़लम थम जायेगी

ना दिल से सियाही निकलेगी ना सांस मुझे लिख पायेगी

जिस रोज़ नये लब गाएंगे जिस रोज़ मैं चुप हो जाऊंगा

इक चाँद फ़लक से उतरेगा इक रूह फ़लक तक जायेगी

फिर नये नये अफ़सानों में कुछ नये नये चहरे होंगे

फिर नये नये किरदारों के किरदार नये गहरे होंगे

फिर कोई पिरोयेगा रिश्तों को नये नये अल्फाज़ों में

फिर कोई पुरानी रश्मों को ढालेगा नये रिवाज़ों…

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Added by Aazi Tamaam on April 11, 2021 at 8:00pm — 7 Comments

नज़्म: मटर

ज़िंदगी भी मटर के जैसी है 

तह खोलो बिखरने लगती है

कितने दाने महफूज़ रहते हैं उन फलियों की आगोशी में

कुछ टेढ़े से कुछ बुचके से कुछ फुले से कुछ पिचके से

हू ब हू रिश्तों के जैसे लगते हैं

कुनबे से परिवारों से कुछ सगे या रिश्तेदारों से

पर सभी आज़ाद होना चाहते हैं कैद से

रिवायतों से बंदिशों से बागवाँ से साजिशों से

ज़िंदगी भी मटर के जैसी है

तह खोलो बिखरने लगती है

(मौलिक व अप्रकाशित) 

आज़ी तमाम

Added by Aazi Tamaam on April 8, 2021 at 2:00pm — 4 Comments

नज़्म: ख़्वाहिश

कोई ख़्वाब न होता आँखों में 

कोई हूक न उठती सीने में

कितनी आसानी होती 

या रब तन्हा जीने में

दिल जब से टूटा चाहत में

रिंद बने पैमानों के

ढलते ढलते ढल गई

सारी उम्र गुजर गई पीने में

यूँ ही सांसें लेते रहना

यूँ ही जीते रहना बस

हर दिन साल के जैसा 'गुजरा

हर इक साल महीने में

दुनिया डूबी लहरों में

हम डूबे यार सफ़ीने में

देखीं कैसी कैसी बातें

अज़ब ग़ज़ब दुनियादारी

वो कितने ना पाक…

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Added by Aazi Tamaam on April 8, 2021 at 11:30am — 1 Comment

ग़ज़ल: जैसे जैसे ही ग़ज़ल रुदाद ए कहानी पड़ेगी

2122 1122 2112 2122

जैसे जैसे ही ग़ज़ल रूदाद ए कहानी पड़ेगी

वैसे वैसे ही सनम दिल की फज़ा धानी पड़ेगी

रश्म हर दिल को महब्बत में ये उठानी पड़ेगी

दिल जलाकर भी कसम दिल से ही निभानी पड़ेगी

ख़ुश न होकर भी ख़ुशी दिल में है दिखानी पड़ेगी

कुछ न कहकर भी रज़ा दिल की यूँ सुनानी पड़ेगी

हुस्न वालो की सुनो ना ख़ुद पे भी इतना इतराओ

लम्हा दर लम्हा महंगी तुम्हें न'दानी…

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Added by Aazi Tamaam on April 7, 2021 at 3:00pm — 3 Comments

ग़ज़ल: माँ

2212 2212 2222 2

मुझको तेरी आवाज़ से खुशबू आती है

तेरे हर इक अल्फाज़ से खुशबू आती है

आँचल से जैसे इत्र सा झरता रहता है…

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Added by Aazi Tamaam on April 7, 2021 at 8:00am — 4 Comments

ग़ज़ल: रोयेंगे और मुस्कुरायेंगे

2122 1212 22/112

रोयेंगे और मुस्कुरायेंगे

उम्र भर तुम को गुनगुनायेंगे

तुम जो रहते हो बादलों में सनम

तुम को हम कैसे भूल पायेंगे

जब भी देखेंगे आसमानों को

दिल के अरमाँ मचल ही जायेंगे

ग़म की आँधी न रोक पायेंगे

अश्क आँखों से बहते जायेंगे

कैसे रोकेंगे हसरतें दिल की

चीख कर तुम को फ़िर बुलायेंगे

जी न पायेंगे मर न पायेंगे

दिल जलायेंगे…

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Added by Aazi Tamaam on April 5, 2021 at 11:00am — No Comments

ग़ज़ल: कोई समझाए माजरा क्या है

2122 1212 22

कोई समझाए माजरा क्या है

तीरगी क्या है यूँ कि रा क्या है

मिटना हर शय का तो मुअय्यन है

ज़िंदगानी में निर्झरा क्या है

इक समंदर के जैसे लगती हैं

नम सी आँखों में दिल भरा क्या है

टूट कर ख़्वाब गिरते रहते हैं

आँख में आईना सरा क्या है

देख कर उनको आरज़ू करना

दिल की हसरत का दिलबरा क्या है

इश्क़ में रूह गर जो महके, तो

मुश्क़ फ़िर क्या है मोगरा क्या…

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Added by Aazi Tamaam on March 22, 2021 at 5:30pm — 4 Comments

ग़ज़ल: इश्क़ समझे न कोई दीवाना

2122 1212 22

देख कर मुस्कुराना शर्माना

इश्क़ समझे न कोई दीवाना

है कयामत हर इक अदा इनकी

जुल्फ़ें बिखराना हो या झटकाना

सिर्फ़ आता है इन हसीनों को

दिल चुराना चुरा के ले जाना

क्यों किसी का यूँ दिल जलाते हो

क्यों बनाते हो यूँ ही दीवाना

कितना मुश्किल है चाहतों में सनम

पास रहकर भी दूर हो जाना

बेक़रारी में आहें भरता है

जी न पाता है कोई दीवाना

साल हा साल लम्हा…

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Added by Aazi Tamaam on March 16, 2021 at 9:00pm — 11 Comments

ग़ज़ल: "दाँव पर आबरू सी रहती है "

2122 1212 22

बे सबब हाव-हू सी रहती है

दाँव पर आबरू सी रहती है

इश्क़ जब भी किसी से होता है

इक अजब जुस्तजू सी रहती है

लम्हा दर लम्हा दिल मचलता है

हर पहर आरज़ू सी रहती है 

यूँ लगे की हर एक चहरे पर

सूरत इक हू-ब-हू सी रहती है

मन भटकता है वन हिरन बनकर

खुशबु इक रू-ब-रू सी रहती है

ख़ुद से ही अब वो बात करता है

दिल में इक गुफ़्तगू सी रहती है

जलके सब ख़ाक हो…

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Added by Aazi Tamaam on March 11, 2021 at 1:00pm — 7 Comments

ग़ज़ल : "जी ही पाते हैं की न मर पाते"

अरकान- 2122 1212 22

सिर्फ़ इतना हुनर जो पा जाते

काश हम भी किसी के हो पाते

क्यों तुम्हें इतनी जल्दी रहती है

मेरी सुनते कुछ अपनी फ़रमाते

हर किसी से अदब से मिलते हो

अच्छा होता जो थोड़ा इतराते

चारा गर ही हमारा रूठा है

हम किसे ज़ख़्म अपने दिखलाते

फ़िर कहाँ कोई दिल में यूँ चुभता

गर जो रिश्ता सभी से तोड़ आते

चाहतों में भी यूँ तो दीवाने

जी ही पाते हैं की न मर…

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Added by Aazi Tamaam on March 7, 2021 at 1:30pm — 4 Comments

ग़ज़ल: "सनम हमको मिला"

2211  2122  1221  1222  12

चाहत में सिवा ही चाहत के क्या क्या न सनम हमको मिला

हर जख्म मिला है दिल को यूँ मरहम न सनम हमको मिला

किस को है पता यहाँ कौन कब हो जाये यूँ ही बे-वफ़ा

हम जान लुटा आये अपनी फिर भी न सनम हमको मिला

ता उम्र लगा रहा इश्क में भी यूँ तो मिलना बिछड़ना

मिलके न जुदा हो पर कोई ऐसा न सनम हमको मिला

थोड़ा तो क़रार आये या रब इस दिल ए बेजार को

थोड़ा भी सुकूँ गो चाहत में आखिर न सनम हमको…

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Added by Aazi Tamaam on March 5, 2021 at 10:00pm — 2 Comments

ग़ज़ल: "ठहर सी जाती है"

22 22 22 22 22 22 22 22

जब तन्हाई में यादों की बरसात ठहर सी जाती है

इक हूक सी उठती है दिल में ह'यात ठहर सी जाती है



चुपके चुपके आँखों ही आँखों में इश्क़ जवाँ होता है

गर जुम्बिश ना हो आँखों में शुरुआत ठहर सी जाती है



हर पल मिलने की चाहत में पल पल बेताबी रहती है

दिन ढलते ढलते ढल जाता है रात ठहर सी जाती है



होठों पर बात न आ जाये दिल बेचैनी में रहता है

होठों पर आते ही दिल की हर बात ठहर सी जाती है



रह रह कर आहें…

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Added by Aazi Tamaam on March 2, 2021 at 9:30pm — No Comments

"कोई क्यों रहे "

1212 222 212

चढ़ान   में   भी    कोई   क्यों   रहे

ढलान में भी कोई क्यों रहे

सियासती   हो   रंग  ए  आसमाँ

उड़ान में भी कोई क्यों रहे

दुकान-ए-दिल ही जब हो लुट चुकी

अमान…

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Added by Aazi Tamaam on March 1, 2021 at 10:30am — No Comments

ग़ज़ल : "मदारी"

बह्र - मुतक़ारिब मुसम्मन सालिम

अरकान - 122 122 122 122

किसी को मुकम्मल जहाँ देने वाले

किसी को नया आसमां देने वाले

                    **

कि बहती हवा…

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Added by Aazi Tamaam on February 17, 2021 at 4:30am — 3 Comments

ग़ज़ल~ "न मर ही पाये कोई"

बह्र ~ "बह्र-ए- वाफिर मुरब्बा सालिम"  

12112 12112 12112 12112

न चैन पाये है की न सुकूँ .....................ही पाये कोई

ऐसे ले के दर्द ए दिल है जिये.................ही जाये कोई

के चोट जो खाये अपनो से ही ...............अगर

तो ले के भी दिल को अपने कहाँ.............ही जाये कोई

अज़ीब है हाल इश्क में भी.....................सनम है न दवा दिल…

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Added by Aazi Tamaam on February 16, 2021 at 10:00am — No Comments

ग़ज़ल ~ " है स्याही सुर्ख़ फिर अपनी क़लम है ख़ूँ-चकाँ अपना "

122 2122 2122 2122 2

उखाड़ेंगीं भी क्या मिलकर हज़ारों आँधियाँ अपना

पहाड़ों से भी ऊँचा सख़्सियत का है मकां अपना

मिटाकर क्या मिटायेगा कोई नाम-ओ-निशाँ अपना

मुक़ाम ऐसा बनाएंगे ज़मीं पर मेरी जाँ अपना

चला है गर चला है डूबकर मस्ती में कुछ ऐसे

नहीं रोके रुका है फिर किसी से कारवाँ अपना

पहुँचने में जहाँ तक घिस गये हैं पैर लोगों के

वहाँ हम छोड़ आये हैं बनाकर आशियाँ…

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Added by Aazi Tamaam on February 15, 2021 at 3:30pm — 3 Comments

एक और दास्ताँ हुई

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एक और दास्तां सुनो

एक और खूँ चकां हुई

एक और दर्द बड़ गया

एक और राज़दाँ हुई

एक और दाग लग गया

एक और जाँ निहाँ हुई

एक और रूह जम गई

एक और ख़त्म जाँ हुई

एक और आग लग गई

एक और लौ तवाँ हुई

एक और फूल आ गया

एक और सब्ज माँ हुई

एक और हादसा हुआ

एक और बे अमाँ हुई

एक और बचपना गया

एक और रूह जवाँ हुई

एक और…

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Added by Aazi Tamaam on February 14, 2021 at 8:27pm — No Comments

ग़ज़ल~ "जान-ए -जाँ तुम ही वो हसरत वो ख़्वाब लगती हो"

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तुम जो साड़ी में यूँ खिलता गुलाब लगती हो

दिल ये कहता है की बस लाजवाब लगती हो

                      **

किस तराज़ी से तराशा है तुम्हें रब ने भी

दिल पे लगती हो तो सीधे जनाब लगती हो

                      **

हो गई सारी फ़ज़ा देख कर यूँ ही ताजा

चाँद जैसा है बदन पर खुशाब लगती हो

                      **

रोज़ करते हैं इबादत अज़ब करिश्मा है

आयतों की…

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Added by Aazi Tamaam on February 12, 2021 at 10:30am — No Comments

गजल ~ "कलंदर लोग हैं शीशे से पत्थर तोड़ लेते हैं"

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कहानी कोई भी हो अपने मुआफिक मोड़ लेते हैं

सभी किरदारों से किरदार अपना जोड़ लेते हैं

                        **

बड़ी शिद्दत से दुनिया राहों में कांटे बिछाती है

बड़े आराम से हम चुभती नोकें तोड़ लेते हैं

 

               …

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Added by Aazi Tamaam on February 11, 2021 at 10:00am — 2 Comments

रिश्ता निभाता भी रहा

2122 2122 2122 212

प्यार भी करता रहा दिल को जलाता भी रहा

जिंदगी भर मेरी चाहत आज़माता भी रहा

बेबसी की दास्तां किसको सुनाये दिल भला

उम्र भर गम भी रहा और मुस्कुराता भी रहा

बेकरारी में कोई पागल रहा कुछ इस कदर

लौ जलाता भी रहा और लौ बुझाता भी रहा

दिल्लगी भी क्या गज़ब की दास्तां है…

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Added by Aazi Tamaam on February 11, 2021 at 12:00am — 4 Comments

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