For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

Manoj kumar shrivastava's Blog (15)

देशभक्ति का मजा

क्रांतिकारियों ने क्या-क्या सहा होगा,

देशभक्ति का मजा जाने कैसा रहा होगा,

मेरे वीरों का जब लहू बहा होगा,

पवित्र खून से चाबुक धन्य हुआ होगा,

फिरंगियों को भगत ने

दौड़ा-दोड़ा कर कूटा होगा,

बिस्मिल ने भी खजाना

मजे से लूटा होगा,

तो आजाद ने भी जंगल में,

योजना बनाई होगी,

और आजादी पाने वीरों ने,

खूनी होली मनाई होगी,

हथियार लूटने का मजा भी,

अलग रहा होगा,

गरमदल को देख,

ब्रिटिश का पसीना बहा होगा,

गांधी के भी अपने,

ठाठ रहे…

Continue

Added by Manoj kumar shrivastava on December 22, 2017 at 9:46pm — 8 Comments

सुंदरता का अहंकार

एक अहंकारी पुष्प

अपनी प्रसिद्धि पर इतरा रहा है,

भॅंवरों का दल भी,

उस पर मंडरा रहा है,

निश्चित ही वह,

राग-रंग-उन्माद में,

झूल गया है,

स्व-अस्तित्व का,

कारण ही भूल गया है,

तभी तो,

बार-बार अवहेलना,

कर रहा है,

उस माली की,

जिसने उसे सुंदरता के,

मुकाम तक पहुचाया,

संभवतः उसे ज्ञात नहीं,

बयारों ने भी,

करवट बदल ली है,

जो संकेत है,

बसंत की समाप्ति…

Continue

Added by Manoj kumar shrivastava on December 18, 2017 at 7:30pm — 12 Comments

निःशब्द देशभक्त

जब एक सैनिक शहीद होता है

तो साथ में शहीद होती हैं

ढेर सारी उम्मीदें,

ताकत और भावनाएं,

मैं सैनिक नहीं 

न मेरा कोई पुत्र,

पर पूरी देशभक्ति

निभायी

अपनी चहारदीवारी

के भीतर

हाथ में धारित

मोबाईल पर चल रहे

सोशल मीडिया

में शहीद सैनिक

की फोटो पर

"जय हिंद"

लिख कर और

सो गया, तब

रात स्वप्न में

वह शहीद आया,

कहा- मैं अपनी

मिट्टी और आपकी

और सेवा करना

चाह रहा था,

पर कर न पाया,

इसलिए…

Continue

Added by Manoj kumar shrivastava on December 13, 2017 at 2:30pm — 9 Comments

मैं भी कवि-सम्मेलन में जाता हॅूं

मैं कवि-सम्मेलन में जाता हॅूं,

मैं भी कवि-सम्मेलन में जाता हॅूं,

भेद-भाव के दरया को,

पाटने की कोशिश  में,

सूरज के घर में चाॅंद का,

संदेशा  लेकर जाता हॅूं, हाॅं,

मैं भी कवि-सम्मेलन में जाता हॅूं।

खुशियों को ढ़ूंढ़ने निकला हॅूं,

मिल भी गयी दुखदायी खुशी,

दुखदायी खुशी के चक्कर में,

हसीन गम को भूल जाता हॅूं।, हाॅं,

मैं भी कवि-सम्मेलन में जाता हॅूं।

ऐशो-आराम की जिंदगी मिली है,

आराम से सोता पर क्या करूॅं,

पहले हजारों अर्धनिद्रा से…

Continue

Added by Manoj kumar shrivastava on December 3, 2017 at 1:00pm — 4 Comments

देशभक्त तो पैदा कर

दलगत राजनीति से दूर होना चाहिए,

देशहित करने का सुरूर होना चाहिए,

बेशक विचारों में भेद हो सकता है,

पर राष्ट्रहित हो तो गुरूर होना चाहिए,

सत्ता से प्रेम और विपक्ष से गिला नहीं,

किसी दल से भी मैं कभी मिला नहीं,

पर प्रबलता से देशहित में कहता हूँ,

जो देश का है, मैं उसकी पार्टी में रहता हूँ,

और जो भी विपक्षी हो, उससे कहता हूँ,

मतदाता से नहीं, देश से वायदा कर,

मैं सिर्फ तुझे ही सत्ता में चुनूँगा पहले,

पहले अपनी पार्टी में देशभक्त तो पैदा… Continue

Added by Manoj kumar shrivastava on December 2, 2017 at 8:41am — 8 Comments

बदनाम इतिहास

आकाओं की आवाज़
मौनी हो गई है,
इस शहर की सियासत
बौनी हो गई है,
सोच के साथ-साथ,
कर्मों में भी दरख़्त है,
मेरे मसीहा का पेशाना,
पिंडारियों सा सख्त है,
शायद उसे याद नहीं कि
आदमी केवल हाड़-मास है,
कल का चर्चित रहा डाकू,
आज का बदनाम इतिहास है....

मौलिक व अप्रकाशित

Added by Manoj kumar shrivastava on November 30, 2017 at 11:07pm — 5 Comments

बचपन को फिर देख रहा हॅूं,

बचपन को फिर देख रहा हॅूं,

विद्यालय का प्यारा आॅंगन,

साथी-संगियों से वह अनबन,

गुरू के भय का अद्भुत कंपन,

इन्हीं विचारों के घेरे में,

मन को अपने सेंक रहा हूॅं,

बचपन को फिर देख रहा हॅूं,

निष्छल मन का था सागर,

पर्वत-नदियों में था घर,

उछल-कूद कर जाता था मैं,

गलती पर डर जाता था मैं,

लेकिन आज यहाॅं पर फिर से,

गल्तियों का आलेख रहा हूॅं,

बचपन को फिर देख रहा हॅूं,

चिर लक्ष्य का स्वप्न संजोया,

भावों का मैं हार पिरोया,

मेहनत की फिर कड़ी…

Continue

Added by Manoj kumar shrivastava on November 27, 2017 at 9:47pm — 8 Comments

मेरी माॅं का है

सागर जैसी आॅंखों में,
बहते हुए हीरे मेरी माॅं के हैं,
होठों के चमन में,
झड़ते हुए फूल, मेरी माॅं के हैं,
काॅंटों की पगडंडियों में,
दामन के सहारे मेरी माॅं के हैं,
गोदी के बिस्तर में,
प्यार की चादर मेरी माॅं की हैं,
प्यासे कपोलों,
पर छलकते ये चुंबन मेरी माॅं के हैं,
ईश्वर से मेरी,
कुशलता की कामना मेरी माॅं की हैं,
इतराता हूॅं इतना,
पाकर यह जीवन,
मेरी माॅं का है।

मौलिक व अप्रकाशित

Added by Manoj kumar shrivastava on November 25, 2017 at 9:30pm — 10 Comments

ओ निश्छलता!

ओ निश्छलता!

क्यों नहीं हो मेरे मन में?

रहती क्यों,

नवजात शिशु के,

मुखमंडल में,

तुम क्यों रहती!

स्वच्छाकाश,

चंद्र-तारे

और धरातल में,

तुम क्यों रहती!

हवा के झोंकों,गिरि की सुंदरता,

उन्मुक्त गगन में,

क्यों नहीं हो मेरे मन में?

तुम क्यों रहती!

नदी की लहरों,

फूलों के चेहरों और हरियाली में,

क्यों रहती तुम!

माॅं की ममता,

दुआओं और खुशहाली में,

हर वक्त हर घड़ी,

दे रही हो साथ,

प्रभु के दिये,

इस… Continue

Added by Manoj kumar shrivastava on November 25, 2017 at 12:18pm — 10 Comments

प्रश्न तुमसे है

ओ साहब!!!

क्या तुम आधुनिक लोकतंत्र को

लूटने वाले नेता हो!

या रईसी के दम पर बिकने वाले

अभिनेता हो!

क्या तुम वास्तविकता से अंजान

बड़े पद पर बैठे अधिकारी हो!

या मानवता की दलाली करने वाले

शिकारी हो!

क्या तुम भ्रष्टाचार में सिंके हुए

गुर्दे हो!

या विधानालय में वास करने वाले

मुर्दे हो!

तुम जो भी हो !!

मेरा प्रश्न है कि

अपनी बेटी की आबरू लूटने वाले के प्रति

तुम क्या सोचते?

तुम मौन हो!

पर मुझे मालूम है…

Continue

Added by Manoj kumar shrivastava on November 22, 2017 at 10:30pm — 8 Comments

क्यों की तुमने आत्महत्या

जब तुमने की होगी आत्महत्या,

तब कितना कठोर किया होगा मन,

कितनी सही होगी वेदना,

संभवतः तुम्हारे अंगों ने भी,

तुमसे कहा होगा कि,

‘एक बार फिर सोच लो‘,

परंतु तुमने निष्ठुरता का

प्रमाण देते हुए,

अनदेखा कर दिया होगा,

कदाचित तुमने यह भी

नहीं सोचा होगा कि,

तुम्हारे मृत शरीर को

देखकर अवस्थाहीन

हो जाएगी तुम्हारी ‘जननी‘,

जिसका अंश है तुम्हारा शरीर,

तब, चहुंदिशि होगी,

करूणा और क्रंदन

जो चीख-चीख कर

कह रहे होंगे-‘‘आखिर

क्यों की…

Continue

Added by Manoj kumar shrivastava on November 22, 2017 at 7:30am — 4 Comments

खामोश आखें

खामोश आखें

होली आयी और चली गयी,
पिछले साल से भली गयी,
पर किसी ने देखा!
किसका क्या जला?
मैंने देखा,
’उसकी डूबती खामोश आॅंखें’
और भीगी पलकों को,
और वह खड़ा,
एकटक देख रहा था,
’होली को जलते’
जैसे उसे मालूम न हो,
अपनी ‘आॅंखों ’ के कारनामे

मौलिक व अप्रकाशित

Added by Manoj kumar shrivastava on November 20, 2017 at 10:00pm — 5 Comments

चरित्र गिर रहा है

मन में आत्मा में आॅंखों में,

मीठी-मीठी बातों में,

चरित्र गिर रहा है,

मत गिरने दो।

स्नेह में ममत्व में भावनाओं में,

मूल्यों में सम्मान में दुआओं में,

हर क्षेत्र हर दिशाओं में,

चरित्र गिर रहा है,

मत गिरने दो।

वादों में इरादों पनाह में,

विश्वास में परवाह में,

वांछितों की चाह में,

चरित्र गिर रहा है,

मत गिरने दो।

आवाज में अंदाज में,

प्रजा में सरताज में,

कल में आज में,

हर रूप में हर राज में,

चरित्र गिर रहा…

Continue

Added by Manoj kumar shrivastava on November 19, 2017 at 9:30pm — 14 Comments

महफिल का भार

शादी की महफिल में,

हाइलोजन के भार से,

दबा कंधा,

ताशे और ढोल का,

वजन उठाये हर बंदा,

हाइड्रोजन भरे गुब्बारे,

सजाने वालों का पसीना,

स्टेज बनाने गड्ढे खोदने का,

तनाव लिये युवक,

चूड़ीदार परदों पर,

कील ठोंकता शख्श,

पूड़ी बेलती कामगर,

महिलाओं की एकाग्रता,

कुर्सियाॅं सजाते,

युवकों का समर्पण,

कैमरा फलैश में,

चमकते लोगों की शान,

कहीं न कहीं,

इन सबका होना जरूरी है,

किसी की खुशी,

किसी की मजबूरी है,

ये…

Continue

Added by Manoj kumar shrivastava on November 16, 2017 at 10:00pm — 8 Comments

बने-बनाये शब्दों पर

बने-बनाये शब्दों पर
तू क्यों फंदे!
कलम सलामत है तेरी,
तू लिख बंदे,
उम्मीद मत कर कि कोई,
आयेगा तुझे,
तेरे दर पे सिखाने,
इंसां को देख,
तू खुद सीख बंदे,
बुराई लाख चाहे भी,
तुझे फॅंसाना,
अच्छाई को पूज,
खुद मिट जाएंगे,
विचार गंदे।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Manoj kumar shrivastava on November 16, 2017 at 9:30pm — 4 Comments

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-190
"सादर अभिवादन।"
2 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-190
"सर कोई जब न उठा सच की हिमायत के लिएकर्बला   साथ   चले   कौन …"
2 hours ago
Admin replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-190
" स्वागतम "
15 hours ago
Admin posted a discussion

"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189

ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरे के 190 वें अंक में आपका हार्दिक स्वागत है | इस बार का मिसरा नौजवान शायर…See More
Tuesday
आशीष यादव posted a blog post

मशीनी मनुष्य

आज के समय में मनुष्य मशीन बनता जा रहा है या उसको मशीन बनने पर मजबूर किया जाता है. कारपोरेट जगत…See More
Monday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव साहब, प्रस्तुत दोहों की सराहना हेतु आपका हार्दिक आभार। सादर"
Sunday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय जयहिंद रायपुरी जी सादर, प्रदत्त चित्र पर आपने  दोहा छंद रचने का सुन्दर प्रयास किया है।…"
Sunday
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय अशोक भाईजी  सही कहना है हम भारतीय और विशेषकर जो अभावों में पलकर बड़े हुए हैं, हर…"
Sunday
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीया प्रतिभाजी हार्दिक धन्यवाद आभार आपका"
Sunday
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय अशोक भाईजी  हार्दिक धन्यवाद आभार आपका।"
Sunday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी जी सादर, प्रदत्त चित्र पर मेरी प्रस्तुति की सराहना के लिए आपका हार्दिक…"
Sunday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"    आदरणीया प्रतिभा पाण्डे जी सादर, प्रस्तुत दोहों की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार ।…"
Sunday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service