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सेज पर बिछने को होते फूल जैसे पर - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२२/२१२२/२१२२/२


हम जरूरत के लिए विश्वास जैसे हैं
नाम पर सेवा के लेकिन दास जैसे हैं।१।
**
सेज पर बिछने को होते फूल जैसे पर
वैसे पथ के  पास  उगते  घास जैसे हैं।२।
**
है हमारा मान केवल जेठ जैसा बस
कब  तुम्हारे  वास्ते  मधुमास जैसे हैं।३।
**
दूध लस्सी  धी  दही  कब  रहे तुमको
कोक पेप्सी से बुझे उस प्यास जैसे हैं।४।
**
रोज हमको हो निचोड़ा आपने लेकिन
स्वेद भीगे हर  किसी  अहसास जैसे हैं।५।

मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 19, 2020 at 9:53am

आ. भाई सुरेन्द्र नाथ जी, सादर अभिवादन । आपको गजल अच्छी लगी यह मेरे लिए हर्ष का विषय है । उपस्थिति और सराहना के लिए हार्दिक आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 19, 2020 at 9:52am

आ. भाई सालिक गणवीर जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और सराहना के लिए हार्दिक आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 19, 2020 at 9:50am

आ. भाई बसंत कुमार जी, सादर अभिवादन । आपको गजल अच्छी लगी यह मेरे लिए हर्ष का विषय है । उपस्थिति और सराहना के लिए हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by नाथ सोनांचली on July 18, 2020 at 4:30pm

आद0लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर'जी सादर अभिवादन। अच्छी ग़ज़ल हुई है। दाद के साथ मुबारकवाद पेश करता हूँ।

Comment by सालिक गणवीर on July 18, 2020 at 9:39am

भाई लक्ष्मण धामी' मुसाफिर '

सादर प्रणाम

एक और उम्दा ग़ज़ल हुई है, दाद और मुबारकबाद क़ुबूल करें. सादर.

Comment by बसंत कुमार शर्मा on July 17, 2020 at 9:35pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी सादर नमस्कार

।बेहतरीन गज़ल।

आनंद आ गया 

बधाई आपको 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 16, 2020 at 5:24pm

आ. भाई रवि भसीन जी, सादर अभिवादन । आपकी उपस्थिति व उत्साहवर्धन से लेखन सफल हुआ । इसके लिए हार्दिक आभार ।

कमियों की ओर ध्यान दिलाने हेतु पुनः आभार ।

Comment by रवि भसीन 'शाहिद' on July 16, 2020 at 12:39pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' भाई, अच्छी ग़ज़ल हुई है, बधाई स्वीकार करें।


/दूध लस्सी  धी  दही  कब  रहे तुमको/
भाई, इस मिस्रे में कोई लफ़्ज़ (शायद 'दे') छूट गया है, और 'धी' को 'घी' कर लीजिये।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 15, 2020 at 8:54am

आ. भाई तेजवीर जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए आभार ।

Comment by TEJ VEER SINGH on July 14, 2020 at 11:09am

हार्दिक बधाई आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी।बेहतरीन गज़ल।

रोज हमको हो निचोड़ा आपने लेकिन
स्वेद भीगे हर  किसी  अहसास जैसे हैं।५।

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