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एक साँचे में ढाल रक्खा है

२१२२ १२१२ २२
फ़ाइलातुन मुफ़ाइलुन फ़ैलुन

एक साँचे में ढाल रक्खा है
हम ने दिल को सँभाल रक्खा है

तेरी दुनिया की भीड़ में मौला
ख़ुद ही अपना ख़याल रक्खा है

दर्द अब आँख तक नहीं आता
दर्द को दिल में पाल रक्खा है

चल के उल्फ़त की राह में देखा
हर क़दम पर वबाल रक्खा है


मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by Aazi Tamaam on January 20, 2022 at 11:19am

अच्छी रचना हुई आ अनीता जी

बधाई स्वीकार करें

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 7, 2021 at 5:23am

आ.अनिता जी अभिवादन। अच्छे अशआर हुए हैं। हार्दिक बधाई। 

आ. समर कबीर भाई व अमीरूद्दीन जी की बात से से सहमत हूँ। सादर

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 2, 2021 at 4:49pm

बहुत बढ़िया कहा आदरणीया...

Comment by Anjuman Mansury 'Arzoo' on October 21, 2021 at 3:09am

मुहतरमा अनिता मौर्य जी आदाब, अच्छे अशआर कहे आपने, दाद क़ुबूल फ़रमाएं। समर कबीर साहिब से सहमत हूँ। सादर।

Comment by Dr. Vijai Shanker on October 20, 2021 at 11:01pm

अच्छा है , बधाई , सादर.

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on October 20, 2021 at 9:35pm

मुहतरमा अनिता मौर्य जी आदाब, अच्छे अशआर कहे आपने, दाद क़ुबूल फ़रमाएं। समर कबीर साहिब से सहमत हूँ। लेकिन आप तो ओ बी ओ से वर्ष 2010 से जुड़ी हैं। कृपया नियमित रूप से मंच पर आईये। सादर।

Comment by Samar kabeer on October 20, 2021 at 8:28pm

मुहतरमा अनीता मौर्य जी आदाब, ओबीओ पर आपकी ये पहली रचना है शायद ।

अच्छे अशआर हैं, इसे ग़ज़ल इसलिये नहीं कह सकता कि ग़ज़ल में कम से कम पाँच अशआर ज़रूरी होते हैं, इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

'हर क़दम पर बवाल रक्खा है'

इस मिसरे में 'बवाल' को "वबाल" करना उचित होगा ।

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