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2122 2122 2122 2122

बत्तियाँ सारी बुझा कर द्वार पर साँकल चढ़ा कर
मस्त वो अपनी ही धुन में मुझको मुझसे ही चुरा कर

साँस हर मदहोश करती हाथ में खुशबू बची बस
फूल सब मुरझा चुके हैं राह में काँटे बिछा कर

क्या उसे एहसास भी है उस सुलगती सी तपिश का
जिस सुलगती राख में वो चल दिया मुझको दबा कर

सींच कर अपने लहू से ख्वाब की मिट्टी पे मिलजुल
जो लिखी थी दास्तां वो क्यों गया उसको मिटा कर

मेरी पलकों पर सजाए उसने ही सपने सुनहरे
जब कहा क्या सच करें? वो हँस दिया मुझको रुला कर

चूम ले वो आसमाँ ये ही दुआ माँगी हमेशा
क्या पता था यों उड़ेगा घोंसला अपना भुला कर ?

चाहे अब जितना पुकारूँ वो न मुझको सुन सकेगा
व्यर्थ अब करना प्रतीक्षा आस का दीपक जला कर

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 17, 2016 at 11:52am

आ0 प्राची बहन इस गजल के लिए  बधाई ।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on February 16, 2016 at 1:25pm

हौसला अफजाई के लिए आप सभी का तहे दिल से आभार.

ग़ज़ल शिल्प की कुछ और बारीकियों को बताने के लिए आ० सौरभ जी का धन्यवाद 

सादर 

Comment by Ravi Shukla on February 11, 2016 at 3:41pm

आदरणीया डॉ प्राची सिंह जी, बहुत सुन्दर गजल हुई है बधाई स्‍वीकार करें ।

Comment by Amit Tripathi Azaad on February 11, 2016 at 10:48am

आदरणीया डॉ. साहिबा ,फ़ूल सब मुरझा चुके हैं ,शानदार खुबसूरत ........तहेदिल से स्वागत |

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 10, 2016 at 10:04pm

वाह  बेह्तरीन  भाव संपदा . आ० सौरभ जी का कथन  मेरे जैसे नौसिखिये गजल कशिशकार के लिए भी एक शिक्षा है . सादर .


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 9, 2016 at 11:17pm

बत्तियाँ सारी बुझा कर द्वार पर साँकल चढ़ा कर
मस्त वो अपनी ही धुन में मुझको मुझसे ही चुरा कर........... सानी के वो को है करना अधिक उचित होगा. यही इस मिसरे की व्याकरणजन्य माँग है.

 

साँस हर मदहोश करती हाथ में खुशबू बची बस
फूल सब मुरझा चुके हैं राह में काँटे बिछा कर........
साँस हर मदहोश करती .. यह भाषा की दृष्टि से बहुत बढिया प्रयोग नहीं है. ’खुश्बू बची बस’ भी उला मिसरा के गठन को चुनौती दे रहा है.

 

क्या उसे एहसास भी है उस सुलगती सी तपिश का
जिस सुलगती राख में वो चल दिया मुझको दबा कर.......
अच्छा खासा मिसरा बन रहा है - उस सुलगती सी तपिश का क्या उसे एहसास भी है ? इसे उलट-पलट देना समझ में नहीं आया .. :-))
विश्वास है, आप समझ रही होंगी कि शेर के मिसरे गेय कविताओं के मिसरे की तरह नहीं बाँधे जाते. इसी कारण अच्छे कवि अच्छे ग़ज़लकार नहीं बन पाते. :-)))

 

मेरी पलकों पर सजाए उसने ही सपने सुनहरे
जब कहा क्या सच करें? वो हँस दिया मुझको रुला कर
इसी तरह से इस शेर के उला को भी दुरुस्त कर लें - उसने ही सपने सुनहरे मेरी पलकों पर सजाए .. यह कितना स्पष्ट सार्थक वाक्य बन गया !

चूम ले वो आसमाँ ये ही दुआ माँगी हमेशा
क्या पता था यों उड़ेगा घोंसला अपना भुला कर ? ..
वाह !

यही हाल इस मिसरे का है - चाहे अब जितना पुकारूँ वो न मुझको सुन सकेगा 

इसे  वो न मुझको सुन सकेगा चाहे अब जितना पुकारूँ  कर लेना श्रेयस्कर होगा. 


वैसे, ग़ज़लों के लिए आवश्यक अन्य तत्त्व कथ्य और खयाल आपकी परेशानी है ही नहीं.

प्रयास हेतु हार्दिक शुभकामनाएँ

Comment by जयनित कुमार मेहता on February 9, 2016 at 8:39pm
खूबसूरत ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई आपको आदरणीय डॉ प्राची जी..
Comment by Nilesh Shevgaonkar on February 7, 2016 at 9:35pm

.
बत्तियाँ सारी बुझा कर द्वार पर साँकल चढ़ा कर
मस्त वो अपनी ही धुन में मुझको मुझसे ही चुरा कर..............ये मतला अपने आप में पूरी ग़ज़ल है... या पूरा सुखन है. 
.
क्या उसे एहसास भी है उस सुलगती सी तपिश का
जिस सुलगती राख में वो चल दिया मुझको दबा कर.....रोंगटे खड़े हो गए हैं ..
.
मेरी पलकों पर सजाए उसने ही सपने सुनहरे
जब कहा क्या सच करें? वो हँस दिया मुझको रुला कर...वाह वाह 
काश ऐसे प्रयास हम से रोज़ हो सकें ...
बधाई 

Comment by Samar kabeer on February 7, 2016 at 5:38pm
मोहतरमा डॉ.प्राची सिंह जी आदाब,बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़ल हुई है,मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं !
Comment by राजकिशोर मिश्र 'राज' प्रतापगढ़ी on February 7, 2016 at 2:08pm

वाह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्हआदरणीया    लाजवाब    सृजन   के   लिए  बधाई

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