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फिर से मुझको न वो हरा जाए....( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)

2122 1212 22/112

फिर से मुझको न वो हरा जाए
इससे पहले ही कुछ किया जाए (1)

जब वो आँखों से कुछ नहीं कहता
कान में कुछ तो बुदबुदा जाए (2)

बन गया है वो मील का पत्थर
अब उसे ठीक से पढ़ा जाए (3)

यार अब बन गया अदू मेरा
अब भले को बुरा कहा जाए (4)

सीधे रस्ते पे क्या चलेगा वो
जिसका ईमान डगमगा जाए (5)

है जबाँ यार ये महब्बत की
उससे उर्दू में कुछ कहा जाए (6)

*मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 21, 2020 at 8:44am

आ. भाई सालिक गणवीर जी, सादर अभिवादन। अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by सालिक गणवीर on November 20, 2020 at 12:25pm

मुहतरम  बृजेश कुमार 'ब्रज' जी.
सादर अभिवादन
ग़ज़ल पर आपकी शिर्कत और हौसला अफजाई के लिए आपका तह-ए-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ.

Comment by सालिक गणवीर on November 20, 2020 at 12:23pm

उस्ताद -ए -मुहतरम समर कबीर साहिब
आदाब
ग़ज़ल पर आपकी शिर्कत और हौसला अफजाई के लिए आपका तह-ए-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ.आपकी क़ीमती इस्लाह पर तामील होगी जनाब। शुक्रिय :

Comment by सालिक गणवीर on November 20, 2020 at 12:22pm

मुहतरम Chetan Prakash  जी.
सादर अभिवादन
ग़ज़ल पर आपकी शिर्कत और हौसला अफजाई के लिए आपका तह-ए-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ. आपकी इस्लाह सर आखों पर आदरणीय। आवश्यक सुधार करता हूँ मुहतरम। 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 19, 2020 at 9:11pm

बढ़िया ग़ज़ल कही है आदरणीय...बहुतखूब

Comment by Samar kabeer on November 18, 2020 at 6:56pm

जनाब सालिक गणवीर जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें ।

तीसरे शैर पर जनाब चेतन प्रकाश जी से सहमत हूँ ।

Comment by Chetan Prakash on November 18, 2020 at 6:43am

भाई सलिक गणवीर , नमस्कार ! गजल अच्छी है, बधाई, स्वीकार करें ! हाँ, तीसरा शेर संशोधन चाहता है, वाक्य विन्यास की दृष्टि से से भी और सम्प्रेषण की दृष्टि से भी ।

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