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( बेजान था मैं फिर भी तो मारा गया मुझे......(ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)

221 2121 1221 212

बेजान था मैं फिर भी तो मारा गया मुझे
कल घाट मौत के यूँ उतारा गया मुझे (1)

मैं जा रहा था रूठ के लेकिन सदा न दी
था सामने खड़ा तो पुकारा गया मुझे (2)

मैं एक साँस में कभी बाहर न आ सकूँ
दरिया में और गहरे उतारा गया मुझे (3)

अक्सर यही हुआ है मैं जब भी दुरुस्त था
बिगड़ा नहीं था फिर भी सुधारा गया मुझे (4)

देता रहूँ सबूत मैं कब तक वज़ूद का
हर बार हर क़दम पे नक़ारा गया मुझे (5)

वो जानते हैं जिस्म मेरा भी है काग़ज़ी
पर आग से हमेशा गुज़ारा गया मुझे (6)

अहबाब ऐसे हैं तो कमी क्यों अदू की हो
करते हैं याद सबको बिसारा गया मुझे (7)

वो चाहते थे देखना मुझको डरा हुआ
जब डूबने लगा तो उभारा गया मुझे (8)

*मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by सालिक गणवीर on April 21, 2021 at 3:54pm

आदरणीय भाई ब्रजेश कुमार जी

सादर अभिवादन

ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिति और सराहना के लिए हार्दिक आभार.

Comment by सालिक गणवीर on April 21, 2021 at 3:51pm

आदरणीय भाई बसंत कुमार शर्मा जी

सादर अभिवादन

ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिति और सराहना के लिए हार्दिक आभार.

Comment by सालिक गणवीर on April 21, 2021 at 3:49pm

आदरणीय भाई आजी तमाम जी

आदाब

ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिति और सराहना के लिए हार्दिक आभार

Comment by बसंत कुमार शर्मा on April 19, 2021 at 12:43pm

आ. भाई सालिक गणवीर जी, सादर अभिवादन ।अच्छी गजल हुई है हार्दिक बधाई 

Comment by Aazi Tamaam on April 16, 2021 at 3:21pm

सहृदय बधाई स्वीकारें आदरणीय गनवीर जी बेहद खूबसूरत ग़ज़ल हुई है

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 16, 2021 at 9:02am

क्या कहने वाह बेहतरीन ग़ज़ल हुई आदरणीय...हरिक शे'र लाजबाब

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 7, 2021 at 5:51pm

जी, उला मिसरा में होती लग रही है..

Comment by सालिक गणवीर on April 7, 2021 at 5:32pm

आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी जी

सादर अभिवादन

ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिति और सराहना के लिए हृदय से आभार. आप सहीह कह रहे हैं हमेशा की बजाय "सदा ही" लिखना उचित होगा।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 7, 2021 at 5:24pm

आ. भाई सालिक गणवीर जी, सादर अभिवादन ।अच्छी गजल हुई है हार्दिक बधाई । मुझे छटे शेर में लय बाधित होती लग रही है । देखिएगा । सादर

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