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कू-ब-कू शौक़ लिए फिरता है मुझको गुलशन

पत्थरों का रुख़-ए-हस्ती पे गुमाँ होता है l
जब कोई शोला-ए-एहसास धुआँ होता है ll

जिसको इस राह में अहसास जियाँ होता है l
जज्ब-ए-इशक़ वो मकबूल कहाँ होता है ll


आंसुओ में कभी चेहरे की उदासी में कभी l
दर्द जब हद से गुज़रता है अयाँ होता है ll

खून-ए-मजलूम जो होता है ज़मी पर कोई l
मुझ से हस्सास की आँखों से रवाँ होता है ll

आदमी गर्दिशे हालत से घबराये क्यूँ l
चाँद तारों में भी गर्दिश का समाँ होता है ll

क्या करूँ कहके फिर अब अपनी हिकायत तुझसे l
राज़-ए-दिल जब मेरे चेहरे से अयाँ होता हैं ll

कू-ब-कू शौक़ लिए फिरता है मुझको "गुलशन " l
देखना है तेरा दीदार कहाँ होता है ll

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Comment by Mukesh Verma "Chiragh" on April 23, 2014 at 6:02pm

अशफ़ाक़ अली साहेब

इस लाजवाब ग़ज़ल को एक भी कॉमेंट नसीब नहीं हुआ.. विश्वास नहीं हो रहा..हो सकता है इसका कारण उर्दू ज़बान हो.. दिल खुश हो गया.. मेरी जानिब से हज़ारों दाद हाजिर है.. आपके लिए तहे-दिल से दुआएँ.
खून-ए-मजलूम जो होता है ज़मी पर कोई l
मुझ से हस्सास की आँखों से रवाँ होता है ll
 
  क्या करूँ कहके फिर अब अपनी हिकायत तुझसे l
राज़-ए-दिल जब मेरे चेहरे से अयाँ होता हैं ll

कू-ब-कू शौक़ लिए फिरता है मुझको "गुलशन " l
देखना है तेरा दीदार कहाँ होता है ll

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