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ग़ज़ल : अरुन शर्मा 'अनन्त'

बह्र : मुतकारिब मुसम्मन सालिम,

मदरसा बना या मदीना बना दे,
मुझे कीमती इक नगीना बना दे,

बिना मय के जैसे तड़पता शराबी,
समंदर सा प्यासा हसीना बना दे,

मुहब्बत की जिसमें रहे ऋतु हमेशा,
अगर हो सके वो महीना बना दे,

सुकोमल बदन से जरा मैं लिपट लूँ,
मेरे जिस्म को तू मरीना बना दे,
मरीना = मुलायम कपडा

लिखा हो जहाँ नाम तेरी कहानी,
ह्रदय की धरा को सफीना बना दे....
सफीना : किताब

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on November 20, 2013 at 10:38am

मुहब्बत की जिसमें रहे ऋतु हमेशा,
अगर हो सके वो महीना बना दे,
वाह !  बहुत खूब ! 

Comment by ram shiromani pathak on November 19, 2013 at 11:25pm

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति  आदरणीय भाई  जी हार्दिक बधाई  आपको///सादर प्रयास 

Comment by वेदिका on November 19, 2013 at 10:44pm

सुकोमल बदन से जरा मैं लिपट लूँ,
मेरे जिस्म को तू मरीना बना दे,

वाह! बहुत प्यारा शेअर! :-)

बधाई!!  

Comment by Neeraj Nishchal on November 19, 2013 at 7:15pm
बहुत सुन्दर सुन्दर ग़ज़ल कही
आदरणीय अरुण भाई
बधाई

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 19, 2013 at 6:55pm

मदरसा बना या मदीना बना दे,
मुझे कीमती इक नगीना बना दे,
ये कौन कह रहा है ? वैसे मुझे ईंट या पत्थर की कही बात लग रही है.

बिना मय के जैसे तड़पता शराबी,
समंदर सा प्यासा हसीना बना दे,
दोनों मिसरों में बहुत बढिया राबिता नहीं बन रहा है.  वैसे, भाईजी, समन्दर सा प्यासा  हसीना ? .. जय हो.. 

मुहब्बत की जिसमें रहे ऋतु हमेशा,
अगर हो सके वो महीना बना दे,
बहुत खूब !

सुकोमल बदन से जरा मैं लिपट लूँ,
मेरे जिस्म को तू मरीना बना दे,
:-))))... मुझसे भले चाँदी के बटन तेरे जो कुर्ते में तूने लगाये.. :-)))) .. मज़ा आगया.

लिखा हो जहाँ नाम तेरी कहानी,
ह्रदय की धरा को सफीना बना दे,
इसका क्या मतलब हुआ, भाईजी ? कहानी के हिसाब से तो लिखी हो होना चाहिये न. वैसे मुझे कुछ पता नहीं चला सो उलझन में हूँ.

कोशिशों के लिए बधाई और शुभकामनाएँ
शुभेच्छाएँ
 

Comment by Saarthi Baidyanath on November 19, 2013 at 5:08pm

इंशा-अल्लाह ...मुझे कीमती इक नगीना बना दे!.. बहुत खूब जनाब :)

Comment by Nilesh Shevgaonkar on November 19, 2013 at 2:53pm

बहुत ख़ूब ... बधाई 

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on November 19, 2013 at 1:07pm

क्या बात है आदरणीय अरुण भाई

ग़ज़ब के अशआर कहे हैं आपने

लाजवाब

हर इक अशआर पर दिली दाद क़ुबूल करें जय हो

Comment by AVINASH S BAGDE on November 19, 2013 at 10:46am

सुकोमल बदन से जरा मैं लिपट लूँ,

मेरे जिस्म को तू मरीना बना दे, ..kya najuk khayal hai 

sunder/umda gazalअरुण जी ..

Comment by Dr Ashutosh Mishra on November 18, 2013 at 4:57pm

क्या रूमानियत भरा अंदाज सुकोमल बदन से जरा मैं लिपट लूँ,
मेरे जिस्म को तू मरीना बना दे,..भाई वह 

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