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कौन जाने
सिर्फ मैं हूँ,
या कि कोई और भी है,
जो उलझता है,
तड़पता है,
झुलसता है,
कभी फिर
बुझ भी जाता है...

जो उलझता है,
कि जैसे
ज़िन्दगी के क़ायदे-क़ानून
बनकर साजिशों के तार
चारों ओर से घेरा बनाकर
हर नये सपने
हर एक ख़्वाहिश
के सीने में चुभाकर
रवायतों की सलाईयाँ,
बुनते और बिछाते जा रहे हों
मकड़ियों के जाल...

जो तड़पता है,
उसी मानिन्द
जैसे सीपियों में क़ैद नन्हीं बूँद कोई
हो तड़पती तैरने को
पंख फैलाकर समन्दर में;
बड़े ही खूबसूरत
चमचमाते नाम देकर,
सिसकियाँ उस बूँद की
मोती बनाकर,
हैं सजाते लोग
कितने शौक से बाज़ार...

जो झुलसता है,
तजुर्बों की अंगीठी में पड़े
इक नर्म पत्ते सा,
दबा है जो
कई वज़नी
नसीहतों के कोयलों के तले,
बहुत कोशिश करे भी तो
ज़रा सा हिल ही पाता है,
सुलगता है
अंगीठी की
हर एक आँच के साथ...

कौन जाने
सिर्फ मैं हूँ,
या कि कोई और भी है...

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment

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Comment by अजय कुमार सिंह on December 2, 2013 at 3:21pm
आदरणीया कुन्ती जी और प्राची जी, रचना पसन्द करने और उत्साहवर्धन करने के लिये धन्यवाद। साथ ही रचना के एक अंश में बिम्ब की अतार्किकता की ओर ध्यान दिलाने के लिये प्राची जी का  हार्दिक आभार। मैं वस्तुतः इसे बिम्ब की  अतार्किकता की बजाय अभिव्यक्ति की अस्पष्टता कहना चाहूँगा, और इस कमी के लिये अपनी अयोग्यता को नत होकर स्वीकार करूँगा।
यहाँ मैंने  'सीपियों में क़ैद नन्हीं बूँद' उस मोती को कहा है, जो  बूँद जैसा ही कोमल है, और चाहता तो है कि वह भी सागर में पंख फैलाकर तैरा करे, लेकिन वह  क़ैद है, तैर नहीं सकता, नहीं कर सकता पूरा अपना सपना; और लोग उसे 'मोती' का नाम देकर ऊँची ऊँची कीमत लगाते हैं, और बाज़ार सजाते हैं …… लेकिन यह सारा मूल्य, यह सारी  क़ीमत, जो कहने को तो उसी की है, लेकिन उसके किस काम की.…जिसका अपना सपना ही पूरा न हुआ ……!!!

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on November 29, 2013 at 7:40pm

संघर्षों में फंसे, हौसला हारते भाव..परिस्थियों के हाथों असहाय मन के उदगार खुल कर अभिव्यक्त हुए हैं... और साथ ही ये भी ख़याल आश्वस्ति की एक नन्ही सी किरण सा कि "सिर्फ मैं हूँ या कि कोइ और भी है"

अभिव्यक्ति के लिए हार्दिक बधाई.. अजय जी 

जैसे सीपियों में क़ैद नन्हीं बूँद कोई
हो तड़पती तैरने को
पंख फैलाकर समन्दर में;..................................थोडा अतार्किक सा बिम्ब है. (बूँद का पंख फैलाकर समुद्र में तैरना)

Comment by coontee mukerji on November 29, 2013 at 4:21pm

बहुत भाव पूर्ण रचना.हार्दिक बधाई स्वीकार करें अजय कुमार जी.

सादर/कुंती

Comment by अजय कुमार सिंह on November 29, 2013 at 11:49am

आप सभी को रचना पसन्द करने के लिये धन्यवाद। बृजेश नीरज जी और सन्दीप जी! आपके सकारात्मक और सुधारात्मक सुझावों के लिये सादर आभार। इन दोषों और त्रुटियों के साथ भी आपने रचना पसन्द की.…आभारी हूँ।

Comment by annapurna bajpai on November 28, 2013 at 8:17pm

सुंदर रचना बधाई आपको । 

Comment by बृजेश नीरज on November 28, 2013 at 7:48pm

सुन्दर रचना है! आपको हार्दिक बधाई!

पंक्तियाँ तोड़ते समय सावधानी की आवश्यकता होती है, प्रवाह में कभी-कभी बाधा पहुंचती है. इस दृष्टि से रचना एक बार फिर देख लें.

सादर!

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on November 28, 2013 at 7:42pm

बहुत सुन्दर आदरणीय क्या बात है बधाई हो

अंत में कोयलों की जगह कोयले प्रयुक्त करें तो कैसा रहेगा

Comment by Meena Pathak on November 28, 2013 at 5:29pm

बहुत सुन्दर रचना .. बधाई आप को 

Comment by अजय कुमार सिंह on November 28, 2013 at 5:01pm
कविता को पसन्द करने के लिये आप सभी का हार्दिक आभारी हूँ।
Comment by राजेश 'मृदु' on November 28, 2013 at 4:18pm

आपकी अभिव्‍यक्ति अच्‍छी लगी, सादर

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