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आज के बाज़ार पर.. (नवगीत) // --सौरभ

बिस्तर-करवट-नींद तक
रिस आया बाज़ार

हर कश से छल्ले लिए

बातें हुई बवण्डरी
मुदी-मुदी सी आँख में
उम्मीदें कैलेण्डरी

गलबहियों के ढंग पर
करता कौन विचार..  

रजनीगंधा सूँघता
लती हुआ मन रेह का
फेनिल-कॉफ़ी घूँट पर
बाँध तोड़ता देह का

अधलेटे म्यूराल* पर
बाँच रहा अख़बार

खिड़की के बाहर हवा
इतनी कब निर्लिप्त थी
गुलमोहर के गाल पर
होठ धरे संतृप्त थी

उसके दिये रुमाल पर
आँकी थी तब प्यार..

******
-सौरभ

(मौलिक एवं अप्रकाशित)
******

*म्यूराल - दीवार पर उगी हुई मूर्तियाँ, भित्तिचित्र

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Comment

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Comment by ajay sharma on January 18, 2014 at 10:50pm

खिड़की के बाहर हवा 
इतनी कब निर्लिप्त थी 
गुलमोहर के गाल पर 
होठ धरे संतृप्त थी

उसके दिये रुमाल पर 
आँकी थी तब प्यार..

खिड़की .................हवा .............गुलमोहर .......गाल ............होठ .................रुमाल .........प्यार..

kya safar nama hai sir  ji pyar ka ..........speechless...............

Comment by Maheshwari Kaneri on January 18, 2014 at 8:52pm

सार्थक भाव लिए सुन्दर रचना..आभार..

Comment by Shyam Narain Verma on January 18, 2014 at 2:21pm
आपकी इस सुंदर प्रस्तुति पर सादर बधाई ....
Comment by Sushil Sarna on January 18, 2014 at 1:20pm

खिड़की के बाहर हवा 
इतनी कब निर्लिप्त थी 
गुलमोहर के गाल पर 
होठ धरे संतृप्त थी

उसके दिये रुमाल पर 
आँकी थी तब प्यार..     wah behad khoobsoorat bhaavon kee prastuti ka naya andaaz....sundr shabd chayan aur rachna ka sunndr prvaah paathak ko baandhe rakhta hai...ati sundr....haardik badhaaee aa.Sourabj jee


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 18, 2014 at 12:03pm

खिड़की के बाहर हवा 
इतनी कब निर्लिप्त थी 
गुलमोहर के गाल पर 
होठ धरे संतृप्त थी

उसके दिये रुमाल पर 
आँकी थी तब प्यार.. -----वाह... वाह बहुत सुन्दर नव गीत लिखा मजा आ गया पढ़ के बहुत खूब ...बधाई आपको आ.सौरभ जी 

Comment by AVINASH S BAGDE on January 18, 2014 at 10:37am

बिस्तर-करवट-नींद तक 

रिस आया बाज़ार ..mukhada hi itana namkeen hai ki yahi atak gaya ///wah...wah..

फेनिल-कॉफ़ी घूँट पर 
बाँध तोड़ता देह का...sunder 

अधलेटे म्यूराल* पर 
बाँच रहा अख़बार ...kya bat hai kya bat hai सौरभ ji ...wah!

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