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भला हो या बुरा हो बस, शिकायत  फितरतों में है
वो ऐसा शक्स है  जिसकी बगावत  फितरतों में है
**
रहेगा साथ  जब तक वो  चलेगा  चाल उलटी ही
भले  ही  दोस्तों  में  वो, अदावत  फितरतों में है
**
उसे लेना  नहीं  कुछ  भी  बड़े   छोटे  के होने से
खड़ा हो  सामने जो भी, नसीहत  फितरतों में है
**
हुनर  सबको  नहीं  आता  हमेशा  याद  रखने का
भुलाए वो किसी को  क्या, मुहब्बत फितरतों में है
**
कड़ा रूख हुश्न अपनाए बताओ किस तरह बोलो
सुना  है  हमने  तो यारो नजाकत फितरतों में है
**
शरारत गर न करते  तो  कहाँ  वो बच्चे कहलाते  
बुढ़ापा  ये  नहीं   अच्छा  शरारत  फितरतों में है
**
चुभे जो सच वो कहने से जुबा चुप हो यही अच्छा
भले  अच्छा  तुम्हारी भी  सदाकत फितरतों में है     = सत्यता
**
कभी  वो  बाढ़  देता   है  कभी  देता  अकालें  वो
न जाने क्यों खुदा के  भी कयामत फितरतों में है
**
हरारत  वक्त  पर  आये  जरूरी  है, कहावत सच     =  क्रोध
‘मुसाफिर’ पर नहीं  अच्छा हरारत फितरतों में है
**
( रचना - 12 जनवरी 2014 )

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रचना मौलिक और अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर ’

Views: 700

Comment

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Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on June 29, 2014 at 8:34pm

चुभे जो सच वो कहने से जुबा चुप हो यही अच्छा-आ० लक्ष्मण जी,
आपने प्रिय सच बोलने की बात कहकर मन मोह लिया. बधाइयाँ .ऐसे ही ग़ज़ल गों की आज ज़रूरत है.

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on June 29, 2014 at 7:46pm

बहुत ही अच्छी गजल. लक्ष्मण धामी जी!

Comment by वेदिका on June 28, 2014 at 11:47pm

भला हो या बुरा हो बस, शिकायत  फितरतों में है
वो ऐसा शक्स है  जिसकी बगावत  फितरतों में है
**
रहेगा साथ  जब तक वो  चलेगा  चाल उलटी ही
भले  ही  दोस्तों  में  वो, अदावत  फितरतों में है

बेहतरीन गज़ल के बेहतरीन शेअर!

Comment by MUKESH SRIVASTAVA on June 28, 2014 at 7:57pm

waah waaah waah  BAATON BAATON ME KHOOBSOORAT GAZAL KAHANA AAPKE FITRATON ME HAI -nicee


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 28, 2014 at 6:08pm

कभी  वो  बाढ़  देता   है  कभी  देता  अकालें  वो
न जाने क्यों खुदा के  भी कयामत फितरतों में है
**
हरारत  वक्त  पर  आये  जरूरी  है, कहावत सच    
‘मुसाफिर’ पर नहीं  अच्छा हरारत फितरतों में --------- आदरणीय लक्ष्मण भाई , पूरी गज़ल बहुत सुन्दर संदेश दे रही है , बहुत खूब भाई , बधाइयाँ । उओअरोक्त दो शे र खूब पसन्द आये , बधाइयाँ ॥

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on June 28, 2014 at 4:40pm

शरारत गर न करते  तो  कहाँ  वो बच्चे कहलाते  
बुढ़ापा  ये  नहीं   अच्छा  शरारत  फितरतों में है 
**
चुभे जो सच वो कहने से जुबा चुप हो यही अच्छा
भले  अच्छा  तुम्हारी भी  सदाकत फितरतों में है     = सत्यता

प्रिय धामी भाई बहुत ही सुन्दर भाव और लय लिए अच्छी गजल सुन्दर सन्देश भी दाद कुबूलें जनाब। हार्दिक बधाई

जय श्री राधे
भ्रमर ५

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 28, 2014 at 12:47pm

आ० भाई नरेंदर जी , उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक धन्यवाद l

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 28, 2014 at 12:46pm

आ0 शालिनी जी, आपकी उत्साहजनक प्रतिक्रिया के लिए आपका आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 28, 2014 at 12:45pm


आदारणीय भाई विजयशंकर जी, उत्साहवधन के लिए हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 28, 2014 at 12:45pm

आदरणीय भाई अभिनव अरूण जी, गजल की प्रशंसाकर उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक आभार ।

कृपया ध्यान दे...

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