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ग़ज़ल ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, गुमनाम पिथौरागढ़ी

२२  २२  २२  २२  २२  २२

कैलेण्डर के सवालों से सहम जाता हूँ मैं

ईद दीवाली को जब नज़र मिलाता हूँ मैं

परदों से घर का हाल भला  लगता है

परदों से घर की मुफलिसी छुपाता  हूँ मैं

जीवन और गणित का हिसाब यार खरा है

जब आंसूं जुड़ता है हँसी घटाता हूँ मैं

मैं था काफिला था और सफ़र लम्बा

मन्जिल तक जाते तनहा रह जाता हूँ मैं

कोई मुझसे भी पूछे तू क्या चाहे गुमनाम

है प्यास  प्यार की ,प्यासा रह जाता हूँ मैं

गुमनाम पिथौरागढ़ी

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by gumnaam pithoragarhi on December 16, 2014 at 10:08am

शुक्रिया दोस्तो ,,,,,,,,,,,,, आपका साथ हौसला देता है


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 16, 2014 at 9:34am

अच्छी ग़ज़ल कही , बधाई आ. गुमनाम भाई ।

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 15, 2014 at 11:45am

behtareen I ati sundar I

Comment by भुवन निस्तेज on December 14, 2014 at 8:45am

परदों से घर का हाल भला लगता है

परदों से घर की मुफलिसी छुपाता हूँ मैं

क्या बात है भाई! पर मुफ़लिसी का जाती आलम तो ये होता हैपर्दा लगाये या बदन ढकें. आपने काफी अच्छी ग़ज़ल कही है आदरणीय . हाँ, एक बात कहना चाहूँगा की जो आपने मात्राएँ दी है आपके कई मिसरे उसमें बैठ नहीं रहे, शायद आप कोई और ही धुन गुनगुना रहे हो .सादर....


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 13, 2014 at 7:37pm

जीवन और गणित का हिसाब यार खरा है

जब आंसूं जुड़ता है हँसी घटाता हूँ मैं

मैं था, काफिला था और सफ़र लम्बा

मंजिल तक जाते तनहा रह जाता हूँ मैं

उम्दा ग़ज़ल ! बधाई आपको 

Comment by gumnaam pithoragarhi on December 13, 2014 at 5:23pm

शुक्रिया दोस्तो ,,,,,,,,,,,,, आपका साथ हौसला देता है

Comment by Rahul Dangi Panchal on December 12, 2014 at 10:49pm
वाह उम्दा क्या बात है! वाह! बधाई हो! जनाब!
Comment by Neeraj Nishchal on December 12, 2014 at 6:20pm
बहुत ही उम्दा गजल बधाई
Comment by gumnaam pithoragarhi on December 12, 2014 at 5:58pm

शुक्रिया दोस्तो ,,,,,,,,,,,,, आपका साथ हौसला देता है

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 12, 2014 at 12:14pm

परदों से घर का हाल भला  लगता है
परदों से घर की मुफलिसी छुपाता  हूँ मैं

जीवन और गणित का हिसाब यार खरा है
जब आंसूं जुड़ता है हँसी घटाता हूँ मैं
बहुत खूब कहा आदरणीय भाई गुमनाम जी , इस सुंदर गजल के लिए हार्दिक बधाई ।

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