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आज नायक भी यहाँ पर - ग़ज़ल ( लक्ष्मण धामी ' मुसाफिर' )

2122 2122 2122 212

************************
अजनवी  सी  सभ्यता के बीज बोकर रह गए
सोचकर अपना, किसी का बोझ ढोकर रह गए

***
वक्त  सोने  के  जगा करते हैं देखो यार हम
जागने  के  वक्त लेकिन रोज सोकर रह गए

***
लोरियाँ माँ की, कहानी  नानियों की, साथ ही
चाँद तारे , फूल, तितली लफ़्ज होकर रह गए

***
कसमसाकर  दिल जो खोले है पुरानी पोटली
याद कर बचपन  को यारो नैन रोकर रह गए

***
मानता हूँ , है  हसोड़ों  की जरूरत, दुख मगर
आज नायक भी यहाँ पर हो के जोकर रह गए

***
राजनेता  खा  रहे  बादाम-विश्की  मुफ्त  में
मोल को जनता के हिस्से सिर्फ चोकर रह गए

***
पीठ  पीछे  तो गरजते  खूब  तुम ‘नापाक वो’
सामना  होते  ही  लेकिन पाँव धोकर रह गए

***

रचना - 15 दिसम्बर 14
मौलिक और अप्रकाशित

Views: 696

Comment

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Comment by Hari Prakash Dubey on January 8, 2015 at 8:10pm

कसमसाकर  दिल जो खोले है पुरानी पोटली

याद कर बचपन  को यारो नैन रोकर रह गए.........आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सम्पूर्ण रचना सुन्दर है , बधाई आपको !


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 8, 2015 at 8:01pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी , शे र दर शे र बेहतरीन हर अशआर के लिये दिल से  दाद कुबूल करें । सफल और सुन्दर गज़ल के लिये भी बहुत बहुत बधाई  ।

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 8, 2015 at 7:50pm

अच्छी रचना है i सादर i

Comment by somesh kumar on January 8, 2015 at 4:14pm

हर शे'र लाजवाब निकला /

लोरियाँ माँ की, कहानी  नानियों की, साथ ही
चाँद तारे , फूल, तितली लफ़्ज होकर रह गए

मानता हूँ , है  हसोड़ों  की जरूरत, दुख मगर
आज नायक भी यहाँ पर हो के जोकर रह गए

इन दो शे'रों पर विशेष बधाई 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 8, 2015 at 1:57pm

लोरियाँ माँ की, कहानी  नानियों की, साथ ही
चाँद तारे , फूल, तितली लफ़्ज होकर रह गए  -- आदरणीय लक्ष्मण भाई , इस शे र के लिये ढेरों दाद स्वीकार करें । गज़ल के लिये भी बहुत बधाइयाँ ।

Comment by Sushil Sarna on January 8, 2015 at 12:39pm

मानता हूँ , है हसोड़ों की जरूरत, दुख मगर
आज नायक भी यहाँ पर हो के जोकर रह गए
…वाह बहुत खूबसूरत अशआर .... इस सुंदर ग़ज़ल की प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई आदरणीय धामी जी।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 8, 2015 at 12:29pm

आदरणीय भाई विजय शंकर जी ,ग़ज़ल का अनुमोदन करने के लिए  हार्दिक धन्यवाद  l .

Comment by Dr. Vijai Shanker on January 8, 2015 at 12:14pm
" आज नायक भी यहाँ पर हो के जोकर रह गए "
सुन्दर प्रस्तुति, आदरणीय लक्षमण धामी जी , बधाई, सादर।

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