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‘अजी सुनते हो ---

‘हाँ सुनाओ, ‘

‘वह मिसेज मल्होत्रा की बहू, जिसके फरवरी में बेटा हुआ था I वह बेटा निमोनिया से मर गया और हमारी जो महरिन है इसकी ननद के भी लल्ला हुआ था, वह भी तीन दिन पहले डायरिया से मर गया और अपनी बेटी की सहेली -----‘

‘--- उसका बच्चा भी मर गया होगा I’

‘हां बिलकुल ---- ‘

‘मगर यह स्टैटिक्स तुम मुझे क्यों बता रही हो ?’

‘किसे बताऊँ, एक वह अपनी पोती है I छह महीने की हो गयी, उसे जुकाम तक न हुआ I’

(मौलिक व् अप्रकाशित )

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Comment by Hari Prakash Dubey on January 26, 2015 at 11:14am

आदरणीय डॉ गोपाल नारायण श्रीवास्तव सर , सोचने पर मजबूर करती, सुंदर लघुकथा, हार्दिक बधाई ! सादर 

Comment by kanta roy on January 26, 2015 at 8:08am
" छः महीने की हो गई , उसे जुकाम तक ना आया ।"_ समस्त संवेदनाओं को समेटे हुए यह पंक्ति चिंतन पर विवश करती हुई ....क्या है इस सोच का कारण...? क्यों शिक्षित वर्गों में भी कई बार यह सोच उजागर हो जाती है । मननशील होती हुई बार बार इस कथा को पढकर आपको आभार व्यक्त करती हूँ आ.डाॅ.गोपाल नारायण श्रीवास्तव सर जी ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on January 26, 2015 at 7:54am

आजकल इस वैज्ञानिक युग में भी लोगों की मानसिकता इतनी विकृत हो सकती है। औरत को ममता की मूर्ति कहा जाता है उस पर अपनी पोती के लिये ऐसी सोच। आदरणीय डॉ गोपाल नारायण सर आपकी रचना हृदय में खलबली मचा देती है। सादर बधाई आपको इस सार्थक लघुकथा के लिये।

Comment by gumnaam pithoragarhi on January 25, 2015 at 10:33pm

एक उच्च कोटि की लघुकथा के लिए बधाई स्वीकार करें।

Comment by VIRENDER VEER MEHTA on January 25, 2015 at 10:01pm
अंतिम शब्दो में आकर एकाएक कथा का मन पर चोट करना ही पाठक को झकझोर जाता है। अति सुन्दर आदरणीय डॉ गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी।
Comment by Dr. Vijai Shanker on January 25, 2015 at 7:23pm
जुखाम कोई बीमारी नहीं है कि आप इलाज करेगें और वह चली जाएगी और आप ठीक हो जायेंगें।
जुखाम एक जड़ता है , होने लग जाए तो बस हुआ रहता है, जाता नहीं है, एक स्थायी डिसऑर्डर ( विसंगति ) . पता नहीं कब से झेल रहे हैं हम , हालात हैं कि कभी सुथरते नहीं, न सुथरने का नाम लेते हैं। ………फिर भी हमारा यह दावा है हम स्वस्थ हैं ……… नहीं नहीं , हमसे अच्छा कौन है ? ....... ....कोई नहीं , बिलकुल नहीं , कहीं नहीं. ...................... इस कहानी में समाज जुखाम ग्रस्त है.

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 25, 2015 at 6:23pm

आदरणीय बड़े भाई , आ. सौरभ भाई जी का कहना सही है , औरत ही औरत की दुश्मन है , आ, सोमेश भाई जी का प्रश्न भी बहुत सटीक है , सुधरना किसे है  , दादी को या पोती को ! समाज मे व्याप्त इस नीचता को सामने लाती  बहुत सुन्दर लघुकथा आ. बड़े भाई , आपको बहुत बहुत बधाई । 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 25, 2015 at 5:50pm

इस लघुकथा के सापेक्ष भाई सोमेशजी के प्रश्न समीचीन हुए हैं.
वस्तुतः देश के वैज्ञानिकों द्वारा मंगल ग्रह पर यान भेजने न भेजने से कोई फ़र्क नहीं पड़ता. कस्बों-मुहल्लों में ऐसे ही दृश्य अधिक प्रवाही हैं. एक स्त्री की सबसे बड़ी दुश्मन स्त्री ही होती है. वर्ना कोई मर्द नामर्दगी पर नहीं उतर पाता. उसे अपनी माँ से जरूर डर लगता. लेकिन परिवारों में यदि कथा की दादी जैसी सदस्या हों तो पूत फिरंट ही हुआ करते हैं. जिनकी कारिस्तानियों से समाज दाग़दार हुआ करता है.

आदरणीय गोपाल नारायनजी, आपने सामाजिक सोच में व्याप चुकी विकृति को बखूबी उभारा है.
हार्दिक बधाई..


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 25, 2015 at 5:44pm

ऐसी स्त्रियाँ ये कैसे भूल जाती हैं की वो भी किसी की लड़की हैं घिन आती है ऐसी सोच पर ,बहुत सफल लघु कथा हार्दिक बधाई आ० डॉ० गोपाल नारायण जी.  

Comment by somesh kumar on January 25, 2015 at 5:03pm

दादी में ऐसी डाह !ऐसी घृणा अपनी पोती से |क्या अदभुत लघु कथा है |असली जुकाम किसे है ?किसे इलाज की ज़रूरत है ?बहुत से प्रश्न छोड़ती सुंदर लघुकथा |

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