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मुझसे नकाब क्यों ? : हरि प्रकाश दुबे

दिल में रहने वाले मुझसे नकाब क्यों ?

इतना मुझे बता दे मुझसे हिज़ाब क्यों?

 

साकीं यह सुना तू है मदिरा का सागर

लाखों को तूने तारा मुझको जवाब क्यों?

 

मेरे गुनाह लाखों होंगे ये मैंने है माना

गैरों से कुछ न पूछा मुझसे हिसाब क्यों?

 

तूने जिसको अपनाया उसको खुदा बनाया

उनका नसीब है अच्छा मेरा खराब क्यों?

 

छोटी सी ये हस्ती में है कुल कमाल तेरा

बेहद का है तू दरीया फिर मैं हुबाब क्यों?

 

© हरि प्रकाश दुबे

"मौलिक व अप्रकाशित”

Views: 981

Comment

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Comment by khursheed khairadi on March 2, 2015 at 9:01am

साकीं यह सुना तू है मदिरा का सागर

लाखों को तूने तारा मुझको जवाब क्यों?

 

मेरे गुनाह लाखों होंगे ये मैंने है माना

गैरों से कुछ न पूछा मुझसे हिसाब क्यों?

 आदरणीय हरिप्रकाश जी सर ,बहुत बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है |काफ़िये रदीफ़ बहुत अच्छी तरह से निभाये गये हैं |बह्र कहीं कहीं भ्रमित कर रही है |दिलीदाद कबूल फरमावें |सादर |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on March 2, 2015 at 8:55am

आदरणीय हरिप्रकाश जी, उम्दा गज़ल के लिये बधाइयाँ.........

Comment by umesh katara on March 2, 2015 at 7:48am

क्या शिकेयते शेर कहा है पूरी गजल अच्छी बनी है भाई हरि प्रकाश जी बधाई

मेरे गुनाह लाखों होंगे ये मैंने है माना

गैरों से कुछ न पूछा मुझसे हिसाब क्यों?

 

Comment by Dr. Vijai Shanker on March 1, 2015 at 10:01pm
सभी शेर लाजवाब हैं,पर ,
मेरे गुनाह लाखों होंगे ये मैंने है माना
औरों से कुछ न पूछा मुझसे हिसाब क्यों?
इसकी बात कुछ और है।
बहुत बहुत बधाई , इस प्रस्तुति पर, आदरणीय हरी प्रकाश दुबे जी, सादर।

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on March 1, 2015 at 9:19pm

ग़ज़ल अच्छी हुई है, आपके माध्यम से सभी सदस्यों से अनुरोध है कि गजल का वजन और कठिन उर्दू शब्दों का हिंदी अर्थ अवश्य लिखें. बधाई आदरणीय हरिप्रकाश दुबे जी इस प्रस्तुति पर.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on March 1, 2015 at 9:12pm
पहली नज़र में बह्र 22 22 22 22 22 2 जान पड़ती है। प्रयास अच्छा है आदरणीय हरिप्रकाश सर खासतौर पर ये शे'र बहुत पसंद आया
मेरे गुनाह लाखों होंगे ये मैंने है माना
गैरों से कुछ न पूछा मुझसे हिसाब क्यों?
Comment by somesh kumar on March 1, 2015 at 7:57pm

मेरे गुनाह लाखों होंगे ये मैंने है माना

गैरों से कुछ न पूछा मुझसे हिसाब क्यों?

 सुंदर कोशिश भाई जी |प्रयास पर बधाई |

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 1, 2015 at 7:04pm

आ० हरि प्रकाश जी

बहुत सुन्दर रचना  i बधाई हो i

Comment by maharshi tripathi on March 1, 2015 at 6:36pm

 इस खूबसूरत रचना पर हार्दिक बधाई आ.हरिप्रकाश  जी |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on March 1, 2015 at 6:06pm
बह्र? वज़्न?

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