For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ग़ज़ल १२२२-१२२२\१२२२ १२२२ ..करें कोशिश सभी मिलकर हसीं दुनिया बना दें फिर

करें कोशिश सभी मिलकर हसीं दुनिया बना दें फिर 

चलो जन्नत से भी बढ़कर जहां अपना बना दें फिर

लगाकर रेत में पौधे पसीने से चलो सींचें 

ये सहरा सब्ज़ था पहले यहाँ बगिया बना दें फिर

मेरी मानो रियाज़त से बदल जाती है तकदीरें 

हथेली की लकीरों में कोई नक्शा बना दें फिर

जलाकर खेत मेरे गाँव के बोले सियासतदां  

इन्हें रोटी नहीं मिलती इसे मुद्दा बना दें फिर   

दिलों के दरमियां कोई रुकावट क्यों  रहे यारो

गिराकर इन फसीलों को नया रस्ता बना दें फिर

ज़माने ने दिया है फिर नया इक ज़ख्म इस दिल को

अजी हम भी ग़ज़लगो हैं नया मिसरा बना दें फिर

तेरा हो दर्द या मेरा रहे जामिद न दिल ही में

ग़ज़ल 'खुरशीद' जी गाकर इसे दरिया बना दें फिर

मौलिक व अप्रकाशित  

Views: 906

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by khursheed khairadi on March 12, 2015 at 11:15am

आदरणीय गिरिराज सर ,आपका स्नेह मेरी पूंजी है |सादर आभार 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 12, 2015 at 7:29am

आदरणेय खुर्शीद भाई , हमेशा की तरह एक खूबसूरत गज़ल से रू बरू करवाया आपने , सभी अश आर बहुत सुन्दर हुये  हैं , दिली मुबारकबादें कुबूल करें ।

मेरी मानो रियाज़त से बदल जाती है तकदीरें 

हथेली की लकीरों में कोई नक्शा बना दें फिर

जलाकर खेत मेरे गाँव के बोले सियासतदां  

इन्हें रोटी नहीं मिलती इसे मुद्दा बना दें फिर   

दिलों के दरमियां कोई रुकावट क्यों  रहे यारो

गिराकर इन फसीलों को नया रस्ता बना दें फिर  --- ये अशआर बहुत ख़ास लगे , हार्दिक बधाई ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on March 12, 2015 at 5:19am

वाह वाह वाह ... आदरणीय खुर्शीद सर क्या खूब ग़ज़ल हुई है .... 

जलाकर खेत मेरे गाँव के बोले सियासतदां  

इन्हें रोटी नहीं मिलती इसे मुद्दा बना दें फिर ............. करारा शेर 

दिलों के दरमियां कोई रुकावट क्यों  रहे यारो

गिराकर इन फसीलों को नया रस्ता बना दें फिर............ अनुभवी बल्लेबाज़... फसीलों का खूब प्रयोग किया है.. यहाँ मैं कहता तो फसीलों दिमाग में आता नहीं और समझौता करके कह देता .... गिराकर फासलों को हम नया रस्ता बना दें फिर ...

ये दोनों अशआर कमाल के हुए है -

लगाकर रेत में पौधे पसीने से चलो सींचें 

ये सहरा सब्ज़ था पहले यहाँ दरिया बना दें फिर

मेरी मानो रियाज़त से बदल जाती है तकदीरें 

हथेली की लकीरों में कोई नक्शा बना दें फिर

मतला से मक्ता तक बेहतरीन और उम्दा ग़ज़ल .... आज की ग़ज़ल... आपकी ग़ज़लों का पाठ ... मेरे लिए सदैव एक पाठ होता है. इस बेहतरीन ग़ज़ल से रु ब रु कराने के लिए हार्दिक आभार. 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 12, 2015 at 12:24am

बहुत सही ... दाद कुबूल करें आदरणीय खुर्शीद भाई

Comment by Dr. Vijai Shanker on March 11, 2015 at 11:04pm
करें कोशिश सभी मिलकर हसीं दुनिया बना दें फिर
चलो जन्नत से भी बढ़कर जहां अपना बना दें फिर
बहुत ही सुन्दर एवं प्रभावी प्रस्तुति, आदरणीय खुर्शीद खैरादी जी , बधाई, सादर।
Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 11, 2015 at 10:58pm

लगाकर रेत में पौधे पसीने से चलो सींचें

ये सहरा सब्ज़ था पहले यहाँ दरिया बना दें फिर             वाह! वाह !बहुतखूब सर!

मेरी मानो रियाज़त से बदल जाती है तकदीरें 

हथेली की लकीरों में कोई नक्शा बना दें फिर        ग़जब! जवाब नही इस शेर का!

ज़माने ने दिया है फिर नया इक ज़ख्म इस दिल को

अजी हम भी ग़ज़लगो हैं नया मिसरा बना दें फिर     वाह वाह ! आपकी हाजिर जवाबी भी कमाल है सर!

 इस खुबसूरत गजल पर ढेरों दाद व  बधाइयाँ आदरणीय!!

Comment by maharshi tripathi on March 11, 2015 at 5:46pm

लगाकर रेत में पौधे पसीने से चलो सींचें 

ये सहरा सब्ज़ था पहले यहाँ दरिया बना दें फिर,,,,,,,,वाह!!! आपकी सोच को सलाम आ.खुर्शीद जी |

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 11, 2015 at 4:10pm

बहुत खूब ख़ुर्शीद साहब। अच्छे अश’आर हुए हैं। दाद कुबूल करें

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 11, 2015 at 12:32pm

आ० खुर्शीद भाई

सारी की सारी गजल बेमिसाल  i कहूं किस तरह अपने दिल का मैं हाल i

कमाल है खुर्शीद भाई i  सादर i

Comment by Hari Prakash Dubey on March 11, 2015 at 10:10am

आदरणीय खुर्शीद  भाई , बहुत ही लाजवाब प्रस्तुति है , सभी अ'शआर  खूबसूरत हैं, बहुत बहुत बधाई आपको ! सादर    

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . . रिश्ते

दोहा पंचक. . . . रिश्तेमिलते हैं  ऐसे गले , जैसे हों मजबूर ।संबंधों को निभा रहे, जैसे हो दस्तूर…See More
18 minutes ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन व आभार।"
17 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post सच काफिले में झूठ सा जाता नहीं कभी - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आ. भाई रवि जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और सुंदर सुझाव के लिए हार्दिक आभार।"
17 hours ago
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"बेशक। सच कहा आपने।"
18 hours ago
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"मेरा प्रयास आपको अच्छा और प्रेरक लगा। हार्दिक धन्यवाद हौसला अफ़ज़ाई हेतु आदरणीय मनन कुमार सिंह जी।"
18 hours ago
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"आदाब।‌ नववर्ष की पहली गोष्ठी में मेरी रचना पर आपकी और जनाब मनन कुमार सिंह जी की टिप्पणियों और…"
18 hours ago
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"प्रेरक रचना।मार्ग दिखाती हुई भी। आज के समय की सच्चाई उजागर करती हुई। बधाइयाँ लीजिये, आदरणीय उस्मानी…"
19 hours ago
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"दिली आभार आदरणीया प्रतिभा जी। "
19 hours ago
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"हार्दिक आभार आदरणीय उस्मानी जी। "
19 hours ago
pratibha pande replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"आजकल खूब हो रहा है ये चलन और कभी कभी विवाद भी। आपकी चिरपरिचित शैली में विचारोत्तेजक लघुकथा। बधाई…"
19 hours ago
pratibha pande replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"समसामयिक विषय है ये। रियायत को ठुकराकर अपनी काबलियत से आगे बढ़ना अच्छा है,पर इतना स्वाभिमान कम ही…"
19 hours ago
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"आदाब। हार्दिक स्वागत आदरणीय मनन कुमार सिंह जी। समसामयिक और सदाबहार विषय और मुद्दों पर सकारात्मक और…"
20 hours ago

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service