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है तमस भरी कि हवस भरी- ( एक तरही ग़ज़ल ) - लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

11212     11212     11212      11212
******************************************
नई ताब दे  नई सोच दे  जो पुरानी है   वो निकाल दे
रहे रौशनी  बड़ी देर तक  वो दिया तू अब यहाँ बाल दे
***
है तमस भरी  कि हवस भरी नहीं कट रही ये जो रात है
तू ही चाँद है तू ही सूर्य भी  मेरी रात अब तो उजाल दे
***
जो नहीं रहे वो तो फूल थे ये जो बच रहे वो तो खार हैं
मेरे  पाँव भी  हुए  नग्न हैं  मेरी  राह अब  तू बुहार दे
***
न तो पीर दे  न चुभन ही दे मेरे पाँव में  ये जो फाँस है
नहीं मिल रही  कहाँ गुम हुई  तुझे है पता तू निकाल दे
***
कभी मयकशी  में हूँ डूबता  कभी आरती  तेरी कर रहा
मेरा इश्क भी  कोई इश्क है  न खुश करे  न मलाल दे
***
मौलिक और अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’
***
******यह गजल मूलतः "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-58 के लिए लिखी थी किंतु किसी

कारणवश उसमें शामिल न हो सका । प्रबु़़द्ध जनों से आग्रह है कि इसमें

निहित कमियों से अवगत कराएं और सुझाव दें ।

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 2, 2015 at 4:02pm

अच्छा प्रयास है आ. लक्ष्मण जी, दाद कुबूल कीजिए

Comment by shree suneel on May 2, 2015 at 1:12am
नई ताब दे नई सोच दे जो पुरानी है वो निकाल दे
रहे रौशनी बड़ी देर तक वो दिया तू अब यहाँ बाल दे
ख़ूब आदरणीय लक्ष्मण जी, बधाई

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 1, 2015 at 9:45pm

आदरणीय लक्ष्मण भाई , गज़ल बहुत अच्छी कही है , एक शे र में काफिया दोष है जिसे आ. कबीर भाई बता चुके हैं , देख लीजियेगा ॥ आपको गज़ल के लिये बधाइयाँ ॥

Comment by Dr. Vijai Shanker on May 1, 2015 at 8:55pm
न तो पीर दे न चुभन ही दे मेरे पाँव में ये जो फाँस है
नहीं मिल रही कहाँ गुम हुई तुझे है पता तू निकाल दे॥
बहुत खूब, पूरी ग़ज़ल बहुत खूबसूरत है , आदरणीय लक्षमण धामी जी , बधाई, सादर।
Comment by MAHIMA SHREE on May 1, 2015 at 7:41pm

खूबसूरत ग़ज़ल कही है ..बधाई आपको

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on May 1, 2015 at 6:45pm

आदरणीय धामी सर!

कभी मयकशी  में हूँ डूबता  कभी आरती  तेरी कर रहा
मेरा इश्क भी  कोई इश्क है  न खुश करे  न मलाल दे     वाह! कमाल कि गिरह लगाई है सर! क्या कहने!

इस शेर के अलावा और कोई शेर प्रभावित नही करते! आ० धामी सर आपके स्तर की रचना नही हो पाई है!

शायद व्यस्तता का परिणाम हो!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on May 1, 2015 at 3:38pm
आदरणीय लक्ष्मण धामी सर जी बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है। शेर दर शेर दाद हाज़िर है।
बुहार को बदलना होगा।
Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 1, 2015 at 3:31pm

अच्छा प्रयास है ..बधाई..आ. समर साहब की बात से सहमत हूँ आल के साथ आर काफ़िया दोषपूर्ण है 
सादर 

Comment by Samar kabeer on May 1, 2015 at 2:48pm
जनाब लक्ष्मण धामी जी,आदाब,तरही मिसरे पर बहुत शानदार ग़ज़ल कही है आपने,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं |

"जो नहीं रहे वो तो फूल थे ये जो बच रहे वो तो खार हैं
मेरे पाँव भी हुए नग्न हैं मेरी राह अब तू बुहार दे"

इस शैर में क़ाफ़िया बदल गया है,कृपया देख लीजियेगा |
Comment by narendrasinh chauhan on May 1, 2015 at 2:23pm

कभी मयकशी  में हूँ डूबता  कभी आरती  तेरी कर रहा
मेरा इश्क भी  कोई इश्क है  न खुश करे  न मलाल दे

खूब सुन्दर ग़ज़ल

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