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ख़ौफ़ खाता हूँ …

ख़ौफ़ खाता हूँ 

तन्हाईयों के फर्श पर रक्स करती हुई
यादों की बेआवाज़ पायल से

ख़ौफ़ खाता हूँ
मेरे जज़्बों को अपाहिज़ कर
अश्कों की बैसाखी पर
ज़िंदा रहने को मज़बूर करती
बेवफा साँसों से

ख़ौफ़ खाता हूँ
हयात को अज़ल के पैराहन से ढकने वाली
उस अज़ीम मुहब्बत से
जो आज भी इक साया बन
मेरे जिस्म से लिपट
मेरे बेजान जिस्म में जान ढूंढती है
और ढूंढती है
ज़मीं से अर्श तक
साथ निभाने की कसमों के बेरहम लम्हे
जो रगों में दौड़ते लहू में
दर्द के दरिया बहाते हैं

चलो अच्छा हुआ
जिस्म का ज़मीं साथ छूट गया
उसके साथ होने का
इक तिलस्म टूट गया
लेकिन न जाने क्योँ
मैं फिर भी खौफ खाता हूँ
बारहा ख़ाके सपुर्द होने के बाद भी
कफ़स से जिस्मानी पिंजर के उठ 
गली के किसी नुक्कड पर
लौट आता हूँ
लेम्प पोस्ट की पीली रोशनी में
सर झुकाये बुत की तरह बैठी
बीते लम्हे की परछाई के चेहरे पर
पश्चाताप में पिघल
खारे पानी में भीगे
रुखसारों को देखने के लिए रुक जाता हूँ
मगर क्या मैं ये देख पाऊंगा
शायद हाँ या शायद नहीं
मैं कल भी ख़ौफ़ खाता था
शायद मैं आज भी ख़ौफ़ खाता हूँ
इसीलिये बिन देखे ही उसे

मैं अपने जिस्मानी पिंजर की कफ़स में लौट आता हूँ

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 694

Comment

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Comment by Sushil Sarna on October 8, 2015 at 6:05pm

आदरणीय  सतविंदर कुमार जी रचना के भावों पर आपकी भावात्मक उपस्थिति का हार्दिक आभार। 

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on October 7, 2015 at 8:59pm
बहुत सुंदर रचना के लिए हृदयतल से बधाई आदरणीय सुशील sarna जी
Comment by Sushil Sarna on October 6, 2015 at 12:37pm

आदरणीय समीर कबीर  जी प्रस्तुति में निहित अहसासों ने आपके जज़्बातों को छुआ ये रचना  के लिए सुखद अनुभूति है। इस मान के लिए आपका दिल से आभार। 

Comment by Sushil Sarna on October 6, 2015 at 12:34pm

आदरणीया प्रतिभा पाण्डेय जी प्रस्तुति में निहित अहसासों को आपने  जो मान दिया है उसके लिए आपका हृदय से आभार। 

Comment by Sushil Sarna on October 6, 2015 at 12:32pm

आदरणीय डॉ गोपाल जी भाई साहिब रचना ने आपको स्पंदित किया ये मेरे लिए गर्व  की बात है। आपको दिल से शुक्रिया सर। 

Comment by Samar kabeer on October 5, 2015 at 11:31pm
जनाब सुशील सरना जी,आदाब,आपकी ये कविता बहुत पसंद आई ,बहुत डूब कर लिखते हैं आप,वाह क्या कहने,इस सुन्दर प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।
Comment by pratibha pande on October 5, 2015 at 9:21pm

चलो अच्छा हुआ 
जिस्म का ज़मीं साथ छूट गया 
उसके साथ होने का 
इक तिलस्म टूट गया 

बहुत गहरी भावनाएं लिए है आपकी ये पूरी रचना ,हार्दिक बधाई आपको इस भाव पूर्ण कृति के लिए आदरणीय सुशील जी 
 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on October 5, 2015 at 8:51pm

इसीलिये बिन देखे ही उसे

मैं अपने जिस्मानी पिंजर की कफ़स में लौट आता हूँ------ बहुत खूब . वाह सरना जी

Comment by Sushil Sarna on October 5, 2015 at 7:29pm

आदरणीया कांता रॉय जी रचना में निहित भावों को आत्मीय स्वीकृति देती आपकी मधुर शाब्दिक शैली ने रचना को जो मान दिया है उसके लिए हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on October 5, 2015 at 7:27pm

आदरणीय गिरिराज भाई साहिब रचना के भावों पर आपकी भावात्मक उपस्थिति का हार्दिक आभार। 

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