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कुछ कहो तो सही रोकता कौन है

    २१२ २१२ २१२ २१२

है सही या गलत, सोचता कौन है । 

सच को सच आजकल बोलता कौन है ।

 

यूँ तो सब ही बराबर के हक़दार हैं

इक तराज़ू में पर तोलता कौन है ।

 

अब भी पानी की इक बूँद की आस में

रातभर चाँद को ताकता कौन है ।

 

माँ को गुज़रे हुए सालभर हो गए

हर बुराई से फिर रोकता कौन है ।

 

इक मुलाकात थी और कुछ भी न था

करवटें ले के फिर, जागता कौन हैं ।

बोझ गम का लिये आ गये जब यहाँ

कुछ कहो तो सही रोकता कौन है ।

 

थी कभी रौनकें इस हवेली में भी

दौर गुज़रा तो अब पूछता कौन है ।

 

अब ज़रा सा ठहर जा मेरी ज़िंदगी

इस तरह रात-दिन भागता कौन है ।

 

हाथ में हाथ रखकर न यूँ बैठिये

मुफ्त में रोटियाँ बाँटता कौन है ।

(मौलिक एवम अप्रकशित)

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Comment by नादिर ख़ान on February 25, 2016 at 11:11am

आदरणीय लक्ष्मण जी, आदरणीय गिरिराज जी एवं आदरणीय जयनित जी हौसला अफ़ज़ाई का बहुत शुक्रिया , आप सभी ने रचना में अपना कीमती वक़्त दिया आभार... 

Comment by जयनित कुमार मेहता on February 24, 2016 at 11:27pm

आदरणीय नादिर खान जी, शानदार ग़ज़ल कही आपने।

बधाई!!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 24, 2016 at 4:40pm

आदरनीय नादिर खान भाई , बहुत अच्छी ग़ज़ल कही है आपने दिल से बधाइयाँ आपको । 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 24, 2016 at 11:44am

अब भी पानी की इक बूँद की आस में

रातभर चाँद को ताकता कौन है ।

क्या कहने आ० भाई नादिर खान जी हार्दिक बधाई स्वीकारें l

कृपया ध्यान दे...

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