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कुंडलिया. . . . झोला

कुंडलिया. . . . झोला

झोला   लेकर  हाथ  में, चले   मुरारी   लाल ।
भाव देख कर थम गई,  उनकी बढ़ती चाल ।।
उनकी बढ़ती  चाल , पसीना टप -टप टपके ।
कैसे  लें  सामान , जेब  को   लगते   झटके ।।
भर  कर  ठंडी  साँस , मुरारी फिर यह बोला ।
क्या  लेना  सामान , भला  है  खाली  झोला ।।

सुशील सरना / 19-9-26

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Added by Sushil Sarna on September 19, 2026 at 12:59pm — No Comments

भाषा से भी बढ़ इक भाषा

है भाषा का उपकार बड़ा

बना दिया हमको इनसान।

भाषा से भी बढ़ इक भाषा

जिसकी होती नहीं जबान।



प्यारा-सा नवजात कभी जब

इस दुनिया में आता है।

ना शब्दों का बोध अभी बस

रोता है चिल्लाता है।

उसके रोते ही माँ तत्क्षण

अपना क्षीर पिलाती है।

कैसे जननी की थपकी से

धुन लोरी की आती है।

कैसे लाती है इक ममता

शिशु के होठों पर मुस्कान।

भाषा से भी बढ़ इक भाषा

जिसकी होती नहीं जबान।



कितनी गहरी उनकी भाषा

बोल नहीं जो पाते…

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Added by Dharmendra Kumar Yadav on August 19, 2026 at 12:45pm — No Comments

गोस्वामी तुलसीदास जी के प्रति श्रद्धांजलि

सहित लखन अरु जानकी, विपिन गए रघुनाथ।
राम धाम तुलसी गए, अवधी अवध अनाथ।

भावार्थ:- प्रभु श्रीराम, माता जानकी और लक्ष्मण जी के वनगमन के पश्चात जो दशा अवध (अयोध्या) और अवधी (अयोध्या वासियों) की हुई थी वही हालत गोस्वामी तुलसीदास जी के बैकुंठ धाम जाने के बाद अवध और अवधी (अवधी भाषा) की हो गई है।

"मौलिक व अप्रकाशित"

Added by Dharmendra Kumar Yadav on August 19, 2026 at 11:35am — No Comments

सांकल मन के द्वार पर

सांकल मन के द्वार पर



जब-जब जहाँ कहीं फूल खिले

याद तुझे किया था हमने ...



कहती थी न ...

"क्या...

तुम्हारे मन के द्वार तक

मेरे दिल की दस्तक नहीं पहुंची ?"



दस्तक पहुँची

पहुँची हर बार

भाग कर साँकल खोली

कोई था न द्वार पर

चिरकाल से जाने-पहचाने

अकेलेपन के सिवा

हाँ, इस दर्दीले

अकेलेपन के सिवा

कुछ और न था

लौट आया मैं खाली हाथ

न, न, न

मुठ्ठी में लिखा नाम तो

तुम्हारा ही था

केवल… Continue

Added by vijay nikore on July 27, 2026 at 9:00am — 2 Comments

हरिगीतिका छंद

  

हरि नाम लो हरि नाम लो हरि, नाम लो  हरि नाम लो।

यह नाम  ही  है  सत्य  मानव,  भोर लो नित शाम लो।

करते  रहो  नित  भक्ति  प्रभु  की, नित्य प्रभु आराधना।

तब  बिन  कहे   हर  एक  होगी,  पूर्ण   मंगल  कामना।।   

*

आ  जाइये  प्रभु …

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Added by Ashok Kumar Raktale on July 24, 2026 at 7:26pm — 4 Comments

दोहा पंचक - - - - शोखी

दोहा पंचक. . . . . शोखी

शोख उमर की शोखियाँ, चंचल दृग संकेत ।

भीगा यौवन मद भरा, दिल को करे अचेत ।।

अधरों ने की दिल्लगी, अधरों से कल रात ।

जिसका डर था हो गई, शर्मीली सी बात ।।

बारिश में अच्छा लगे, नजरों को संवाद ।

इच्छाओं का मन करे, मिल कर फिर अनुवाद ।।

हल्की- हल्की जब पड़ी, यौवन पर बौछार ।

प्रणय निवेदन में गया, तन ही तन से हार ।।

मिलने की बेताबियाँ, नजरों के  अनुरोध ।

उन्मादों में कब हुआ, सही - गलत का बोध ।।

सुशील…

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Added by Sushil Sarna on July 21, 2026 at 1:21pm — No Comments

चौपाइयाँ

दोहा

बरखा के बढ़ते क़दम, आये  हैं  अब पास।

दूर नहीं है साजना, सुरभित सावन मास।। 

चौपाई

वह फुहार वह साथ तुम्हारा। हरपल था सुरभित अति प्यारा।।

मन   साजन  यह  कैसे  भूले। साथ-साथ   तुम  हम  थे   झूले।।

*

तुम   थे  झूले   थाम   कलाई। मैं   साजन   कितनी  शरमाई।।

तुम  जब-जब  थे  पींग बढ़ाते। हम   इक  दूजे  में   खो  जाते।।

*

झुकीं-झुकीं  मेरी  ये  अँखियाँ। देख रहीं थीं हँस-हँस  सखियाँ।।

पर  साजन  तुम  रुके न माने।…

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Added by Ashok Kumar Raktale on July 14, 2026 at 12:30pm — 4 Comments

बरसात

बरसात

 

घन गरजे अंधियारी छाई,

बिजली अम्बर पर इठलाई  

बूँदें टपकी टप-टप भाई

रिमझिम रिमझिम बारिश आई

 

पत्ते खड़के भीगे लरजे

चिड़िया सहमी बादल गरजे,

कुत्ते दुबके गैया भागी

इक नन्हीं सी गुड़िया जागी

सुनकर उसकी तेज रुलाई

रिमझिम रिमझिम बारिश आई

 

सड़कों से बह निकला पानी

राहगीरों ने छतरी तानी,

छप-छप करते कदम बढ़ाते

ठोकर खाते गिरते जाते

बूँदें ले आयीं…

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Added by Ashok Kumar Raktale on July 4, 2026 at 10:33pm — 4 Comments

दोहा सप्तक. . . .मंच

दोहा सप्तक. . . . . मंच



अभिनय करते मंच पर, माटी के किरदार ।

जीवन की अनुभूतियाँ, करते वो साकार ।।



यह जग तो वह मंच है, जिसमें रंग अनेक ।

कहीं कहकहे गूँजते, कही दर्द  अतिरेक ।।



निश्चित सबको छोड़ना, जीवन का यह मंच ।

पर्दा गिरते ही मिटें , झूठे सभी प्रपंच ।।



आदि - अन्त के मध्य को, मंच करे साकार ।

इस जीवन के सत्य को, कहते हैं संसार ।।



आया जो इस मंच पर, गूँजे उसका नाम ।

हुआ अँधेरा बोलता , किरदारों का काम ।।



करे… Continue

Added by Sushil Sarna on May 30, 2026 at 2:42pm — 4 Comments

रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)

बह्र: 22 22 22 22 22 2 

रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए

जंगल का कानून है पहला, चुप रहिए

मँहगाई से पागल जनता, चुप रहिए

पूँजीपति को सारी सुविधा, चुप रहिए

 

प्रश्न…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 30, 2026 at 10:17am — 3 Comments

दास्तां

एक हो दास्तां तो सुनाएं,

लंबी है कहानी, फिर कभी।

मिले थे जिस जगह इक उम्र पहले,

वो धुंधली सी निशानी, फिर कभी।

अभी तो ज़ख्म ही ताज़ा बहुत हैं,

वो यादों की ज़बानी, फिर कभी।

अकेलेपन से दोस्ती कर ली है मैंने,

तुम्हारी मेहरबानी, फिर कभी।

मिरी जुनूँ की दीवानी न देखी तुमने,

वहशतों का ये मंज़र, फिर कभी।

लबों पर ठहरी है बात जो अब तलक, 

वही बे-ज़ुबानी, फिर कभी।

ख़लाओं में जो ढूँढती है तुम्हें, 

हमारी हैरानी, फिर…

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Added by रोहित डोबरियाल "मल्हार" on May 29, 2026 at 12:45pm — 1 Comment

समय

समय को दोष देना क्यूँ समय जीना सिखाता है

 

समय की गति सुनिश्चित है समय ही तो विधाता है।।

 

समय का खेल कुछ यूँ है कि कट जाए हो जैसा भी

कहीं गर हो बुरा तो भी ये अनुभव ही कराता है।।

 

बड़ा बलवान होता है समय इसकी बड़ी बातें

कोई कितना भी सँभले पर निवाला हो ही जाता है।।

 

समय को जिन्दगी में जो समझ ले है समय उसका

अजब हैं…

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Added by Awanish Dhar Dvivedi on May 19, 2026 at 4:45pm — No Comments

माँ

माँ यह शब्द नहींं केवल

इस जग की माँ से काया है।

हम सबकी खातिर अतिपावन

माँ के आँचल की छाया है।१।

माँ यह विषय अलौकिक है

परब्रह्म जीव के जैसा ही।

माँ इस सृष्टि की अनुपम है

कारक ईश्वर है ऐसा ही।२।

माता बच्चों की होती है

पालक सर्जक शुभ सुखराशी।

माँ की गोदी में पलते हैं

अज विष्णु ईश प्रभु अघनाशी ।३।

हैं शास्त्र सदा से ही कहते

माँ की पद्वी सर्वोत्तम है।

माँ का स्नेहामृत पाने को

जग में…

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Added by Awanish Dhar Dvivedi on May 19, 2026 at 4:42pm — No Comments

बहुत सोचती हैं क्यों ये औरतें

बहुत सोचती हैं क्यों ये औरतें



बेगुनाही और

इन्साफ की

बात क्यों सोचती हैं ये औरतें

चुपचाप अहिल्या बन क्यों नहीं जातीं  ?


अस्मिता और

सवाल उठाने की

बात क्यों सोचती हैं ये औरतें

चुपचाप द्रौपदी बन क्यों नहीं जातीं …
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Added by amita tiwari on May 14, 2026 at 10:00pm — 1 Comment

गन्ने की खोई

पाँच सालों की उम्र,

एक लोहे के कोल्हू में दबी हुई है।

दो चमकदार धूर्त पत्थर (आंखें) हमें घुमा रहे हैं,

और हम... जो खेतों से कटकर आ रहे हैं।

वे हमारे 'अधिकार' नहीं निचोड़ते,

वे हमारे भीतर कहीं आत्मा तक निचोड़ते हैं।

पहले वे मीठी बातें करते हैं, जैसे शक्कर की चाशनी,

फिर हमें परतों में दबाकर,

हमारा 'रक्त' मत पेटियों (ईवीएम) के गिलास में भर लेते हैं।

जब चुनावी कोल्हू रुकता है,

तब हम इंसान नहीं बचते...

हम…

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Added by आशीष यादव on May 11, 2026 at 9:33am — 1 Comment

मशीनी मनुष्य

आज के समय में मनुष्य मशीन बनता जा रहा है या उसको मशीन बनने पर मजबूर किया जाता है. कारपोरेट जगत मनुष्य को संवेदनहीन कर रहा है. यह मोबाइल का युग जिसने सबको अपनी गिरफ्त में ले रखा है जिससे नवजात बच्चे तक अछूते नहीं हैं . इसी को ध्यान में रखकर मैंने मुख्य शीर्षक मशीनी मनुष्य के अंतर्गत कई कविताओं को लिखने की कोशिश की है.

01

शीर्षक: कारपोरेट कीबोर्ड 

उंगलियाँ नाचती हैं…

मकाम पर नहीं, काली कुंजियों के मैदान…

Continue

Added by आशीष यादव on April 20, 2026 at 12:31am — No Comments

गर्भनाल कब कट पाती है किसी की

कहीं भी कोई भी माँ

अमर तो नहीं होती

एक दिन जाना होता ही है सब की माताओ को

फिर भी

जानते बूझते भी मन को ये क्या हो जाता है…
Continue

Added by amita tiwari on April 14, 2026 at 7:30pm — 3 Comments

प्यार का पतझड़

एक दूसरे में आश्रय खोजते

भावनात्मक अवरोधों के दबाव में

कभी ऐसा भी तो होता है ...



समय समय से रूठ जाता है

प्यार रूठता नहीं

प्यार सूख जाता है

वह पहचाना नहीं जाता तब

पतझड़ में पत्तों की तरह

पीला, सूखा ... कुम्लाहया



एक असहनीय दर्द

शब्द गले में अटके

अधरों तक आए, भारी

और भारी

कुछ भी कहने में असमर्थ

रिश्ते के मुड़े पन्नों पर कुछ आँसू

बह-बह जाती है शब्दों की स्याही

व्यथा का मूल स्रोत खोजती



कितनी तीव्र… Continue

Added by vijay nikore on April 14, 2026 at 8:19am — 1 Comment

दोहा दशम. . . . . उम्र

दोहा दशम् . . . . उम्र



ठहरी- ठहरी उम्र अब, करती एक सवाल ।

कहाँ गई जब जिंदगी, रहती थी खुशहाल ।।



यादों में ही रह गए , हसीं उम्र के साल ।

करें अधूरी हसरतें , मन में बड़ा मलाल ।।



मुड़ - मुड़ देखे उम्र जो, पीछे छूटे मोड़ ।

क्या है अपने पास अब, क्या आए हम छोड़ ।।



रही शिकायत वक्त से, गया उम्र जो छीन ।

कहाँ वक्त की धुंध में, लम्हे गए हसीन ।।



उम्र ढली रहने लगे, दूर - दूर सब लोग ।

तनहा बैठे भोगते , तनहाई का रोग ।।



घटता… Continue

Added by Sushil Sarna on April 6, 2026 at 12:48pm — 3 Comments

कुंडलिया

दरियादिल हो बाप जब, करता कन्यादान।

दयावान भगवान हो, रखता उसका मान।

रखता उसका मान, भात नरसी-सा भरता।

आठ पहर धन-धान्य, वस्त्र की वर्षा करता।

कहते कवि 'कल्याण', मिले तब जीवन साहिल।

करके कन्यादान, दिखाए जब दरियादिल।।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on March 31, 2026 at 8:30pm — 2 Comments

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