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जब कदम बढ़ गए सरकशी की तरफ

आदमी चल पड़ा  गुमरही की तरफ

 

मुतमइन हैं सभी अब अंधेरों में भी

देखता कौन है रोशनी की तरफ 

 

पागलों की तरह भागते हम रहे

हमने देखा नही ज़िंदगी की तरफ

 

दुश्मनी कर चुके आप सबसे बहुत

कुछ कदम तो चलें दोस्ती की तरफ

 

सबने देखी मेरी मुस्कुराहट मगर

किसने देखा मेरी बेबसी की तरफ

 

बोझ गम का लिए क्यूँ खड़े हो मियां

इक पहल तो करो तुम खुशी की तरफ

 

आस तुझसे है नादिर सभी को यहाँ

यूँ नज़र मत झुका बेबसी की तरफ

    (मौलिक एवं अप्रकाशित)  

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 6, 2016 at 1:31pm

इस उम्दा कोशिश के लिए हर्दिक बधाई नादिर भाई. 

Comment by Ashok Kumar Raktale on August 6, 2016 at 10:50am

वाह ! बहुत खूबसूरत गजल  हुई  है आदरणीय नादिर खान साहब. बहुत-बहुत बधाई स्वीकारें.सादर.

Comment by नादिर ख़ान on August 5, 2016 at 9:57pm

हौसला अफजाई के लिए आप सभी का बहुत बहुत शुक्रिया .... इस बार के तरही मुशायरे के वक़्त हम सपरिवार आगरा और अलीगढ़ के दौरे पर थे । 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 5, 2016 at 11:31am

आदरणीय नादिर खान भाई , बेहतरीन तरही गज़ल हुई है ,गिरह भी अच्छी लगाई है । दिली मुबारक बाद कुबूल करें । मुशाइरे मे क्यों नही पोस्ट की थी ?

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 4, 2016 at 5:53pm
बहुत खूबसूरत ग़ज़ल हुई है आदरणीय । दो शब्दों के अर्थ जानना चाह रही हूँ
1 सरकशी 2 गुमरही ।
सादर
Comment by Samar kabeer on August 4, 2016 at 5:07pm
जनाब नादिर खान साहिब आदाब,बहुत उम्दा तरही ग़ज़ल कही आपने,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल। फरमाएं ।
Comment by Shyam Narain Verma on August 4, 2016 at 3:52pm
बहुत खूबसूरत ग़ज़ल! आपको बहुत-बहुत बधाई!

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