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प्रेम पचीसी(दोहे)

प्रीत-पगे दोहे (प्रेम-पचीसी)
मुझको मुझसे छीनकर, बनते हो अनजान ।
निर्मोही तुमको कहूँ, या समझूँ नादान ।। ... 1

झरना साजन तुम भए, मैं जन्मों की प्यास ।
पीकर भी प्यासी मरुँ, रहता कंठ उदास ।। ... 2

प्रीत छुपाऊँ किस तरह, कैसे ढाँकूँ लाज ।
फूलों से छुपता नहीं, काँटों का यह ताज ।। ... 3

तुम सावन के मेघ हो, मैं मरुधर की रेत ।
जा बरसे हो बाग़ में, कैसे पनपे हेत ।। ... 4

संग तुम्हारे जो कटा, वो पल है अनमोल ।
तुम बिन सूना जो रहा, वो दिन फूटा ढोल ।। ... 5

साजन तुम हो राजपथ, मैं पगडंडी गैल ।
आओगे कब गाँव में, बाट उडीकूँ छैल ।। ... 6

तुम शहरों की धूम हो, मैं गाँवों की पीर ।
साजन मेरी आँख का, कब सूखेगा नीर ।। ... 7

तेरे रस्ते पर बिछे, मेरे बेसुध प्राण ।
साजन तेरी चाह का, गड़ा हुआ है बाण ।। ... 8

तेरे दर्शन का अमृत, भर लूँ दोनों नैन ।
घूँट-घूँट तुझको सजन, पीऊँ सारी रैन ।। ... 9

तुझको सोचूँ रात दिन, अज़ब हुआ है हाल ।
बढ़ता जाता है मरज़, मुझको आन सँभाल ।। ... 10

रात हमारे पास है, नींद तुम्हारे पास ।
तुम सोवो हम जाग लें, यही जिया की आस ।। ... 11

साजन तुम तरुवर घने, मैं मुरझाई बेल ।
याद रहेगा उम्र-भर, चार दिनों का मेल ।। ... 12

मन रेशम की पोटली, शोला तेरा प्यार ।
आग लुकाऊँ किस तरह, हँसता है संसार ।। ... 13

नींद उड़ाकर ले गए, छोड़ गए क्यों जान ।
तुम बिन जीना है कठिन, मर जाना आसान ।। ... 14

इक पलड़े में पीव है, दूजे में संसार ।
प्रेम-तराजू झुक गया, काँटा पहुँचा पार ।। ... 15

प्रेम न जाने वासना, प्रेम न जाने डाह ।
खर्चो तो खूटे नहीं, मन में प्रेम अथाह ।। ... 16

नींद उड़ाकर ले गई, साजन तेरी याद ।
जागी तो सोई नहीं, नयन-मिलन के बाद ।। ... 17

जबसे तेरी लौ लगी, जलती हूँ दिन रात ।
बाहर काली रैन है, भीतर है परभात ।। ... 18

उल्फ़त अपना दीन है, दिलबर है अल्लाह ।
आयत जैसी पाक है, दीवाने की आह ।। ... 19

कलमा तेरे नाम का, पढ़ कर दिल है शाद ।
सिज़्दा तेरे रूप को, मन में तेरी याद ।। ... 20

साजन तुम तो दूर हो, ऊँची नभ की डार ।
उचकूँ कितना भी मगर, हाथ न आये प्यार ।। ... 21

मेरी पूजा-आरती, मेरा व्रत-उपवास ।
साजन तेरा प्यार ही, मेरा सत-संन्यास ।। ... 22

अंधे का सपना भई, गूँगे का है गीत ।
किस विध समझाऊँ तुझे, अपने मन की प्रीत ।। ...23

साजन झौंका वात का, मैं बुझती सी जोत ।
नूर बचाले नेह का, अँधियारा मत पोत ।। ... 24

तुम जैसा कोई नहीं, मेरे जैसे लाख ।
हुंडी लिख दो प्रेम की, बढ़ जायेगी साख ।। ... 25
मौलिक एवम् अप्रकाशित ।
© 'खुरशीद' खैराड़ी जोधपुर 9413408422

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 5, 2017 at 1:42pm

इन भाव-प्रवण दोहों पर अशेष बधाइयाँ स्वीकारें, आदरणीय खुर्शीद भाई. आपकी रचनाओं का भाव पक्ष इतना सशक्त होता है कि हृदय भावमय हुआ मुग्ध हो जाता है. समर्पण का यह देसज भाव अत्युच्च निवेदन का सुन्दर उदाहरण है. 

अब तो इस शृंखला के अन्य दो भागों को तुरत पढ लेने की हो रही है. 

शुभ-शुभ


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 2, 2017 at 6:22pm

आदरणीय ख्र्शीद भाई , सभी 25 दोहे लाजवाब हैं , बधाई स्वीकार करें \

Comment by Samar kabeer on September 1, 2017 at 10:07pm
जनाब ख़ुर्शीद खैराड़ी जी आदाब,आपके प्रेम पचीसी दोहे बहुत अच्छे लगे,प्रवाह और शिल्प दोनों ही सशक्त हैं,बहुत ख़ूब वाह, इस बधिय प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।
दोहा नम्बर 9 में 'पीऊँ'शब्द सही है क्या,या 'पियूँ" से बनाया गया शब्द है ?
Comment by Mohammed Arif on September 1, 2017 at 11:18am
आदरणीय खुर्शीद खैराड़ी जी आदाब, बहुत सुंदर प्रेम की अभिव्यक्ति हुई है इन दोहों में । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।
Comment by PHOOL SINGH on August 31, 2017 at 4:07pm

बेहतरीन 

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