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केक के बोलते टुकड़े (लघुकथा)

इस बार उसकी ज़िद पर उसके जन्मदिन पर उसकी फ़रमाइश मुताबिक ख़ास लोगों को आमंत्रित किया गया था। तीन दिन लगातार छुट्टियां होने के बावजूद ताऊजी, चाचा-चाची या उनके बच्चे... कोई भी नहीं आया था। हां, दादा-दादी आये थे और आज सुबह वापस भी चले गए थे। आज उसे स्कूल जाना था, लेकिन मम्मी-पापा के समझाने के बावजूद आज वह स्कूल नहीं गया।
"बहुत हो गया गुड्डू! अब चुपचाप पढ़ने बैठ जाओ, घर पर ही तुम्हारी क्लास लगेगी आज!" मम्मी के सख़्त आदेश पर वह पढ़ने तो बैठ गया, लेकिन अतीत में खोया रहा अपने ताऊजी, चाचा-चाची और दादा-दादी से मिले स्नेह और दुलार को याद करते हुए।
"लो अभी तो यह केक खालो तुम, फिर होटल से चाउमीन मंगवा दूंगी।" मम्मी द्वारा परोसे गए बर्थडे-केक के तिकोने टुकड़ों में उसे अपनों के द्वारा ही तोड़ा गया संयुक्त परिवार नज़र आ रहा था। संयुक्त परिवार वाले दिनों की कलह याद कर उसने प्लेट आगे सरका दी और फिर से पढ़ने का स्वांग रचने लगा। वह जुड़े हुए सुंदर केक को याद करते हुए तिकोने टुकड़ों को अब भला कैसे खा सकता था। संयुक्त परिवार और एकल परिवार की टीचर द्वारा सिखाई परिभाषाएं उसे स्मरण हो आईं। दादा-दादी की अनमनी सी विदाई के दृश्य याद कर उसकी आंखें भीग गईं।

(मौलिक व अप्रकाशित)
[०२-१२-२०१७*ई़द-ए-मीलाद-उन-नबी*]

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Comment by JAWAHAR LAL SINGH on December 5, 2017 at 8:06pm

आज की परिस्थति को दर्शाता और बच्चों के मनोभाव का बखूबी चित्रण हुआ है! बधाई!

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on December 5, 2017 at 7:33pm

जनाब शेख शहज़ाद साहिब , बहुत सुन्दर लघुकथा हुई है ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं 

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on December 4, 2017 at 9:29pm

रचना पर समय देकर अनुमोदन और राय साझा करते हुए हौसला अफ़ज़ाई के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया मुहतरम जनाब समर कबीर साहिब और जनाब तेजवीर सिंह साहिब।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on December 4, 2017 at 9:21pm

अनुमोदन के साथ अपनी समीक्षात्मक टिप्पणी और विचार साझा करते हुए मेरी हौसला अफ़ज़ाई के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया मुहतरम जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहिब, मुहतरमा राजेश कुमारी साहिबा और जनाब  सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' साहिब ।

Comment by नाथ सोनांचली on December 3, 2017 at 3:45pm
आद0 शेख शहज़ाद उस्मानी साहब सादर अभिवादन। बहुत बेह्तरीन विषय को आधार बनाकर आपने लघुकथा कही, बहुत खूब।आद0 बहन राजेश जी के बातों से सहमत हूँ कि सबसे ज्यादा खामियाजा मासूम बच्चों को ही बटवारे का उठाना पड़ता है।इस लघुकथा पर आपको हार्दिक बधाइयाँ निवेदित है।सादर
Comment by Samar kabeer on December 3, 2017 at 12:19pm
जनाब शैख़ शहज़ाद उस्मानी जी आदाब,बहुत उम्दा और सार्थक लघुकथा,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।
Comment by TEJ VEER SINGH on December 3, 2017 at 11:05am

हार्दिक बधाई आदरणीय शेख उस्मानी जी।बेहतरीन लघुकथा।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on December 2, 2017 at 7:46pm

चाहे संयुक्त परिवार टूटते हों या एकल परिवार सबसे ज्यादा खामियाज़ा मासूम बच्चों को उठाना पड़ता है केक को केन्द्रित कर एक गंभीर मुद्दे को उठाया है आपने .बहुत सार्थक लघु कथा आद० उस्मानी जी बधाई आपको .

Comment by Mohammed Arif on December 2, 2017 at 1:34pm
आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी जी आदाब,
बाल मन में जो छवि अंकित हो जाती है वो अमिट हो जाती है । आजकल के हमारे समाजों में संयुक्त परिवार का नामोंं निशान ही ख़त्म हो गया है । परिणाम असुरक्षा और अपनेपन का नितांत अभाव । अकेलेपन की नागफनी के काँटे दिनरात चुभते हैं । हमारी बात दिल में ही रह जाती है । हम अपना हाले-ए-दिल किसे सुनाएँ, कोई सुनने वाला भी नहीं है । ऐसे हमारे बच्चे भी पिसा रहे हैं । हम उन्हें सुविधाएँ तो तमाम दे रहे हैं मगर संवेदनहीन भी बना रहे हैं । रिश्तों की अहमियत क्या होती है वे अब भूलते जा रहे हैं । बाल मन की हत्या करते जा रहे हैं ।
इस सशक्त लघुकथा के लिए आपको दिली मुबारकबाद और ईद-ए-मिलाद की ढेरों मुबारबाद ।

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