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रंगों से सराबोर गीली साड़ियों से लिपटी कुछ ग्रामीण मज़दूर महिलायें टोली में गली से गुजरीं।


"उधर देखो और बताओ कि उनके अंग-अंग रंगीन हैं या वस्त्र?" एक रंगीन मिज़ाज पुरुष ने अपने साथी से कहा।


"वस्त्र गीले और रंगीन हैं और अंग सूखे और रंगहीन! समझ में नहीं आता तुम्हें?" साथी ने उसकी आंखों के सामने चुटकी बजाते हुए कहा।


(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on February 24, 2018 at 7:48am

अनुमोदन और हौसला अफ़ज़ाई के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया मुहतरम जनाब तस्दीक़ अहमद ख़ान साहिब और जनाब सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' साहिब।

Comment by नाथ सोनांचली on February 22, 2018 at 6:25pm

आद0 शेख शहज़ाद उस्मानी साहब सादर अभिवादन। कम शब्दों में अर्थपूर्ण लघुकथा लिखी आपने। बहुत बहुत बधाई। सादर

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on February 22, 2018 at 1:56pm

जनाब शेख़ शहज़ाद साहिब , छोटी मगर असरदार लघुकथा हुई है ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on February 22, 2018 at 6:34am

मेरी इस ब्लॉग- पोस्ट पर समय देकर अनुमोदन और हौसला अफ़ज़ाई के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया मुहतरम जनाब डॉ. विजय शंकर साहिब।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on February 22, 2018 at 6:26am

 रचना आपको पसंद आई। रचना के संदेश सम्प्रेषित हो सके। आपके अनुमोदन और हौसला अफ़ज़ाई के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया मुहतरम जनाब श्याम नारायण वर्मा साहिब, जनाब समर कबीर साहिब और आदरणीया कल्पना भट्ट जी।

Comment by Dr. Vijai Shanker on February 22, 2018 at 6:25am

आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी जी , बधाई, सादर।

Comment by Samar kabeer on February 21, 2018 at 10:13pm

जनाब शैख़ शहज़ाद उस्मानी जी आदाब,कम शब्दों में सशक्त प्रस्तुति,इस लघुकथा पर दिल से बधाई स्वीकार करें ।

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on February 21, 2018 at 8:02pm

गहन कटाक्ष| हार्दिक बधाई इस रचना के लिए| 

Comment by Shyam Narain Verma on February 21, 2018 at 7:23pm
बहूत उम्दा लघुकथा आदरणीय, हार्दिक बधाई l सादर
Comment by Nita Kasar on February 21, 2018 at 4:29pm

नजर अपनी अपनी नज़रिया अपना अपना ।जाकी रही भावना जैसी ,गहन कटाक्ष करती कथा के लिये बधाई आद० शेख़ शहज़ाद उस्मानी जी ।

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