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प्राचीन गुरुकुल

पूर्णतया शिक्षा को गुरू समर्पित थे
कंद,मूल,फल,बिना जोता अन्न खाते थे
पठन -पाठन को समय बचाते थे
तभी तो गुरुजन श्रृषि कहलाते थे

गुरुकुल के प्राँगण में व्यर्थ वाद वर्जित था
गुरू ज्ञान-धारा से हर छात्र सिंचित था
चरणों में उनके नतमस्तक हो जाते थे
तभी तो गुरुजन श्रृषि कहलाते थे

राजा उनसे मिलने गुरुगृह जब जाते थे
आयुध अपने बाहर रख अन्दर आते थे
उलझनें शासन की,उन स॔ग सुलझाते थे
तभी तो गुरुजन श्रृषि कहलाते थे

मौलिक एव॔ अप्रकाशित

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Comment by Usha Awasthi on August 7, 2018 at 1:37pm

धन्यवाद

Comment by babitagupta on August 6, 2018 at 8:15pm

गुरूकुल की अहमियत को दर्शाती रचना, हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिएगा आदरणीया ऊषा दी।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 6, 2018 at 7:14pm

बेहतरीन रचना । हार्दिक बधाई , आदरणीया..

Comment by Neelam Upadhyaya on August 6, 2018 at 5:01pm

आदरणीया उषा अवस्थी  जी, अच्छी रचना की प्रस्तुति के लिए बधाई। 

Comment by Usha Awasthi on August 5, 2018 at 3:01pm
आदाब,
शुक्रिया
Comment by Mohammed Arif on August 5, 2018 at 9:45am

आदरणीया उषा अवस्थी जी आदाब,

                              प्राचीन गुरूकुल शिक्षा प्राप्ति के स्थल को रेखांकित.करती अच्छी कविता । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Usha Awasthi on August 4, 2018 at 9:57pm

आदाब,

बहुत-बहुत शुक्रिया।

Comment by Samar kabeer on August 4, 2018 at 6:14pm

मुहतरमा ऊषा अवस्थी जी आदाब,बहुत अच्छी रचना हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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