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आज उसे अपने वादे के मुताबिक अपनी पत्नी के साथ पास के एक माॅल में ही फिल्म देखने जाना था। कुछ ज्यादा उत्साहित तो नहीं था, लेकिन फिर भी अपनी पत्नी के लिए कुछ 'खास' करने की खुशी उसके चेहरे पर दिखाई दे रही थी। आॅफिस की नोंक झोंक और रास्ते में ट्रैफिक की रोक टोक जैसी बाधाओं को पार कर, जब वो घर पहुंचा तो अत्याधिक शांति पाकर थोड़ा ठिठक सा गया। हाॅल में घुसते ही, एक जाना पहचाना चेहरा जो शायद कुछ किलोमीटर दूर रहता था, सामने आ गया।

"अरे... मां तुम?"

"हां, आज तुम दोनों की सालगिरह है ना। मैंने सोचा तुम्हें आॅफिस से तो वक्त मिलता नहीं, तो क्युं ना मैं खुद हीं शुभकामनाएं दे आंऊ।"

पत्नी के चेहरे पर दिखावटी मुस्कान देखकर उसे आने वाली प्रलय का अंदाजा हो गया था।

"लेकिन मां, हमने तो आज बाहर जाने का प्लान बनाया था।"

"कोई बात नहीं, मैंने भी बहुत दिनों से बाहर का खाना नहीं खाया और अब अकेले बनाकर खाने का जी भी नहीं करता। चलो, आज सब मिलकर खाना खाते हैं।"

अब मसला और भी गंभीर हो गया। पत्नी की नज़र मेज़ पर रखे नाईट शो की टिकटों पर थी, और उसकी नजर अपनी पत्नी पर।

तभी हंसी के साथ आई उस आवाज ने माहौल हल्का कर दिया।

"मैं मज़ाक कर रहीं हुं। मुझे मालूम है कि आज तुम दोनों अकेले जाना पसंद करोगे! जाओ।"

एक मुस्कान के साथ, उम्र की लालिमा लिए उस बुजुर्ग औरत ने अपनी जिंदगी की सारी तकलीफ़ों को परे रखकर, इस शख्स को काबिल बना दिया , इतना काबिल कि आज महीनों तक अपनी मां को देखे बगैर वो सुकुन से जीए, और अपनी खुशियां भी अपनी मां के बगैर हीं मना सके।

भारी कदमों के साथ बाहर आते हीं, मुस्कुराते से उस चेहरे पर आंसुओं की दो चार बुंदें स्वतः हीं छलक उठीं।

(c) हरि प्रकाश दुबे
"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by Hari Prakash Dubey on November 1, 2018 at 9:56pm

आदरणीय  Samar kabeer सर , आदरणीय विनय कुमार भाईसाहब ,आदरणीय TEJ VEER SINGH जी ,आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'जी ,आदरणीय  narendrasinh chauhan जी आप सभी का हृदय की अतल  गहराइयों से हार्दिक आभार ! सादर 

Comment by narendrasinh chauhan on September 12, 2018 at 1:33pm

बहोत खूब सुन्दर रचना । हार्दिक बधाई ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 12, 2018 at 6:11am

आ. भाई हरि प्रकाश जी, अच्छी कथा हुयी है । हार्दिक बधाई ।

Comment by TEJ VEER SINGH on September 11, 2018 at 12:08pm

हार्दिक बधाई आदरणीय हरि प्रकाश दुबे जी।बेहतरीन लघुकथा।विवाहित जीवन की सच्चाई थोड़ी कड़वी है क्योंकि आदमी को शादी के बाद बीवी और माँ के बीच तालमेल बिठाने में बहुत कशमकश का सामना करना पड़ता है।

Comment by Samar kabeer on September 11, 2018 at 12:07pm

जनाब हरिप्रकाश दुबे जी आदाब, बहुत समय बाद आपको पटल पर देखकर प्रसन्नता हुई,इतने दिन कहाँ रहे भाई?

बहुत उम्दा लघुकथा लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by विनय कुमार on September 10, 2018 at 7:10pm

वाह, वाह, बहुत गजब की लघुकथा लिखी है आपने, शानदार. आखिरी पैरा ने तो रचना में चार चाँद लगा दिया. बहुत बहुत बधाई आ हरी प्रसाद दुबे जी इस बेहतरीन रचना के लिए

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