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पिया का पत्र-रामबली गुप्ता

आज खुशी से झूमूँ सखि री पत्र पिया का आया है
भाव भरे अक्षर-अक्षर ने तन-मन को हर्षाया है

लिखते, प्रिये! तुम्हीं से सब कुछ, सुख-दुख की सहभागी तुम
सतरंगी स्वप्नों सा सुंदर जीवन तुमसे पाया है

रहता था निर्वासित सा मन जीवन के निर्जन वन में
पावन प्यार भरा गृह इसको तुमने ही लौटाया है

कहते- पीर भरा यह जीवन जो तपते मरुथल सा था
होकर सिंचित स्नेह से' तेरे हरा भरा हो आया है

नीरव हिय का रंगमहल था साज-बाज सब सूने थे
तेरी पायल की छम छम ने सुर से इसे सजाया है

क्लेश-कलुष-तमपूर्ण हृदय यह पंक भरे सर जैसा था
प्रेम-सरोज खिला कर तुमने पावन इसे बनाया है

सुन सखिया हैं आगे लिखते-- निर्मल मन मन्दिर मेरा
प्रभु की मूर्ति बना कर इसमें तुमको प्रिये! बिठाया है

दिन जैसे-तैसे बीते हर रजनी इंदु निहार कटे
पल-पल प्रिये! तुम्हें यादों मे अपने गले लगाया है

दायित्वों ने दूर किया पर शीघ्र लौट कर आऊँगा
तुमसे दूर भला सजनी ये हृदय कहाँ रह पाया है

कुछ दिन की है बात प्रिये! बस फिर अपना मिलना होगा
यही सोच कर मन को अपने मैंने सदा मनाया है

शेष सखी अब तू ही पढ़ ले और न मैं पढ़ पाऊँगी
'बली' हृदय का नेह उमड़कर आँखों में भर आया है

रचनाकार-रामबली गुप्ता

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by रामबली गुप्ता on October 4, 2018 at 9:55pm

अतिशय आभार आद भाई बृजेश कुमार जी 

Comment by रामबली गुप्ता on October 4, 2018 at 9:53pm

हृदय से आभार आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी जी

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 4, 2018 at 7:23pm

वाह क्या ही सुन्दर भावपूर्ण रचना आदरणीय..

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 4, 2018 at 9:55am

आ. भाई रामबली जी, अच्छी रचना हुयी है । हार्दिक बधाई ।

Comment by रामबली गुप्ता on October 3, 2018 at 10:05am

बहुत बहुत आभार डॉ साहेब

Comment by रामबली गुप्ता on October 3, 2018 at 10:04am

हृदय से आभार आदरणीय समर भाई साहब

Comment by रामबली गुप्ता on October 3, 2018 at 10:04am

सादर आभार भाई सुरेंद्र नाथ जी

Comment by डॉ छोटेलाल सिंह on October 2, 2018 at 6:28pm

आदरणीय रामबली जी बहुत ही जबरदस्त रचना कितनी भी प्रशंसा की जाय कम है जय हो बली जी 

Comment by Samar kabeer on October 2, 2018 at 12:30pm

जनाब रामबली गुप्ता जी आदाब,बहुत सुंदर रचना हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on October 2, 2018 at 6:00am

आद0 रामबली जी सादर अभिवादन। सृंगार रस में डूबी यह रचना बहुत ही अच्छी है।एक एक दृश्य आँखों के सामने दृष्टिगोचर हो रहा है। बहुत बहुत बधाई आपको ऐसी खूबसूरत रचना पर।

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