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नवगीत-वेदना ने नेत्र खोले-बृजेश कुमार 'ब्रज'

वेदना ने नेत्र खोले

रात ने उर लौ लगाई
चांदनी कुछ मुस्कुराई
आज फिर चन्दा गगन में बादलों के बीच डोले
वेदना ने नेत्र खोले

रातरानी खिलखिलाई
रुत रचाती है सगाई
आ गया मौसम बसंती प्रीत पंछी ले हिंडोले
वेदना ने नेत्र खोले

ओ बटोही देश आजा
छोड़कर परदेश आजा
टेरती कोयल सलोनी मन पपीहा नित्य बोले
वेदना ने नेत्र खोले
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 17, 2019 at 10:40pm

आपका हार्दिक धन्यवाद आदरणीय फूल सिंह जी..सादर

Comment by PHOOL SINGH on April 15, 2019 at 5:16pm

रातरानी खिलखिलाई
रुत रचाती है सगाई 
आ गया मौसम बसंती प्रीत पंछी ले हिंडोले 
वेदना ने नेत्र खोले

ब्रिजेश जी, सुंदर रचना बधाई स्वीकारें|

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 9, 2019 at 9:24am

देर से आने के लिए माफ़ी चाहता हूँ आदरणीय सुशील सरना जी..रचना पटल पे आपका स्वागत है...

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 9, 2019 at 9:23am

देर से आने के लिए माफ़ी चाहता हूँ आदरणीय लक्ष्मण धामी जी..रचना पे उत्साहवर्धन के लिए साभार..

Comment by Sushil Sarna on March 26, 2019 at 7:07pm

आदरणीय बृजेश जी सुंदर भावों को चित्रित करते इस नवगीत के लिए हार्दिक बधाई।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 26, 2019 at 7:00pm

आ. भाई बृजेश जी, सुंदर नवगीत हुआ है । हार्दिक बधाई।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 21, 2019 at 6:22pm

उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद आदरणीय समर कबीर जी..आपको भी होली की शुभकामनाएं..

Comment by Samar kabeer on March 21, 2019 at 12:26pm

जनाब बृजेश कुमार 'ब्रज' जी आदाब,अच्छा नवगीत लिखा आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

आपको रंगोत्सव की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं ।

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