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तू भी निजाम नित नया मत अब कमाल कर - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/२२२/१२१२

पर्दा सलीके से बहुत मकसद पे डाल कर

वो लाये सबको देखिए घर से निकाल कर।१।

कितना किया अहित है यूँ अपने ही देश का

लोगों ने उसके नाम  पर  पत्थर उछाल कर।२।

वंशज  उन्हीं  के  कर  रहे  जर्जर  इसे यहाँ

रखना जो कह गये थे ये कश्ती सँभाल कर।३।

कर्तब तेरे  किसी  को  यूँ  आते  समझ  नहीं

तू भी निजाम नित नया मत अब कमाल कर।४।

कर  ली  है  पाँच   साल  यूँ   नेतागरी  बहुत

बच्चों सरीखा देख अब जनता को पाल कर।५।

मौलिक.अप्रकाशित

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 12, 2020 at 3:34am

आ. भाई रवि भसीन जी, गजल पर उपसथिति और उत्साहवर्धन के लिए आभार ।

Comment by रवि भसीन 'शाहिद' on January 11, 2020 at 4:32pm

आदरणीय मुसाफ़िर साहिब, इस सुन्दर ग़ज़ल की रचना पर आपको हार्दिक बधाई।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 10, 2020 at 11:46am

आ. भाई समर जी, सादर अभिवादन। हर रचना पर आपकी उपस्थिति का इन्तजार रहता है । आपकी टिप्पणी के बाद ही आश्वस्ति होती है । स्नेह के लिए आभार ...

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 10, 2020 at 11:41am

आ. भाई सुरेंद्रनाथ जी, सादर अभिवादन। गजल पर मनोहारी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 10, 2020 at 11:36am

रचना को फीचर करने के लिए माननीय एड्मिन महोदय का हार्दिक आभार।

Comment by Samar kabeer on January 9, 2020 at 4:18pm

जनाव लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on January 9, 2020 at 6:41am

आद0 लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी सादर अभिवादन। क्या बेहतरीन ग़ज़ल कही मित्र,, वाह वाह वाह,, और आप खुद में नित नए कमाल कर रहे हैं सृजन पर,, मन बहुत आह्लादित है। अशेष बधाई। कारवाँ यूँ ही चलता रहे।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 9, 2020 at 5:14am

आ. भाई तेजवीर जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद।

Comment by TEJ VEER SINGH on January 8, 2020 at 8:35pm

हार्दिक बधाई आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'जी।बेहतरीन गज़ल।

कितना किया अहित है यूँ अपने ही देश का

लोगों ने उसके नाम  पर  पत्थर उछाल कर।२।

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