आदरणीय लघुकथा प्रेमिओ,
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सीधा आक्रोश आरक्षणके विचारों पे फूटता है नौजवानों की जीवंत समस्या बधाई स्वीकार करें
आदरणीया प्रतिभा जी, सुन्दर कथा है. "अब काउंटर पर धीरे धीरे काला, ठंडा, चिप चिपा, कांच के टुकड़ों और किरचनों से भरा तूफ़ान फैलने लगा था " जब कोल्ड ड्रिंक की ठ्ंढी बोतल तोडी जाती है तो उसमें से धीरे धीरे कुछ भी नहीं होता है. जब उसे पटका जाता है तो वो तुफ़ान एक आवाज के साथ बिखर जाता है. इस चित्रण को थोडा़ सुधार लें. सादर.
आपने चलचित्र का एक टुकड़ा ही मानों सामने चला दिया आदरणीया प्रतिभा जी. कथानक और अभिव्यक्ति का एक-एक विन्दु उभर कर सामने आ रहा है. हार्दिक बधाइयाँ व शुभकामनाएँ
आ.प्रतिभा दीदी गजब! गजब! लिखा आपने तो बहूत कुछ समेट लिया थोडे मे, आपकी ये रचना मेरी पढी रचनाओं की श्रेष्ठ रचना सूची मे शामिल हो गई. बहूत बहूत बधाई आपको.
वाह | बहुत ही बढ़िया कथा हुई है आदरणीया प्रतिभा दी | बधाई स्वीकारें |
बहुत बढ़िया लघुकथा और बहुत प्रभावी पंच लाइन, बधाई आपको
बहुत खूब प्रतिभा जी,'बाऊ जी को पता था कुर्सी हड़बड़ी में नहीं गिरी'.तूफान के आने की पूर्व सूचना जो 'ले पी ले ' से चरम पर पहुँच गई.
गजब! अप्रत्याशित! कोई सोच भी नहीं सकता, इस तरह के आक्रोश को! बहुत बहुत बधाई! आदरणीया आपकी प्रतिभा का कोई जवाब नहीं!
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