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December 2018 Blog Posts

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ७६

2121 2121 2121 212



उड़ रहे थे पैरों से ग़ुबार, देखते रहे

वो न लौटे जबकि हम हज़ार देखते रहे //१



ताब उसकी, बू भी उसकी, रंग भी था होशकुन

गुल को कितनी हसरतों से ख़ार देखते रहे //२



हम तो राह देखते थे उनके आने की मगर

वो हमारा सब्रे इन्तेज़ार देखते रहे //३

तोड़ते थे बेदिली से वो मकाने इश्क़, हम 

टूटते मकाँ का इंतेशार देखते रहे //४ …



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Added by राज़ नवादवी on December 2, 2018 at 3:00am — 8 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
मुझको मंजूर क़यामत से महब्बत होना (ग़ज़ल "राज")

गर है अंजाम महब्बत का क़यामत होना 

मुझको मंजूर क़यामत से महब्बत होना 



बे-मआनी नहीं ये सब है  महब्ब्त की  ख़ुराक

दरमियाँ  उसके गिले  शिकवे  शिकायत होना



आस्माँ  की ही अना का है नतीज़ा यारो  

उसके ही चाँद सितारों में बगावत होना



बेच दी है मेरे गुलशन की महक गुलचीं ने  

इसको कहते हैं अमानत में ख़यानत होना



ये ही करता है मुकम्मल मेरे…

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Added by rajesh kumari on December 1, 2018 at 4:00pm — 13 Comments

ग़ज़ल-खुदकुशी बेहतर है ऐ दिल बेवफ़ा के साथ से

2122 2122 2122 212

खुदकुशी बेहतर है ऐ दिल बेवफ़ा के साथ से

चाहो मत बढकर किसी को चाह की औकात से।

जिसकी ख़ातिर छोड़ दी दुनिया की सारी दौलतें

रख न पाया मन भी मेरा वो दो मीठी बात से ।

दे रहा है तुहमतें उल्टा मुझे ही बेवफ़ा 

बेहया से क्या कहूँ मैं, क्या कहूँ इस जात से।

मैं समझता था मुहब्बत की सभी को हैं तलब

उसको तो मतलब है लेकिन और कोई बात से।

हैं मुसलसल शिद्दतें कुछ यूँ जुदाई की…

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Added by Rahul Dangi Panchal on December 1, 2018 at 3:30pm — 6 Comments

ग़ज़ल

2122 2122 2122 2122



हैं जो अफसानें पुराने, सब भुलाना चाहता हूँ

इस धरा को स्वर्ग-जैसा ही बनाना चाहता हूँ

देश में अपने सदा सद्भाव फैलाएँ सभी जन

अब सभी दीवार नफरत की गिराना चाहता हूँ

दिल सभी का हो सदा निर्मल नदी-जैसा धरा पर

अब परस्पर प्यार करना ही सिखाना चाहता हूँ

धन कमाऊँगा मगर धोखा न सीखूँगा किसी से

हर कदम अपना पसीना ही बहाना चाहता हूँ

है ये तेरा, है ये मेरा की लड़ाई खत्म हो अब

और खुशियाँ संग सबके…

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Added by Dayaram Methani on December 1, 2018 at 12:30pm — 6 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ७५

2122 1122 1212 22/ 112



उसका बदला हुआ तर्ज़े करम सताता था

यार बेज़ार था कुछ यूँ कि कम सताता था //१



होके कुछ यूँ वो ब मिज़गाने नम सताता था

कब मैं समझा कि वो अबरू-ए-ख़म सताता था //२ 



दूर रहने पे तेरी क़ुरबतों की याद आई

पास रहने पे जुदाई का ग़म सताता था //३ 



जिनको इफ़रात थी रिज़्को ग़िज़ा की जीने में

ऐसे लोगों को भी कर्बे शिकम…

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Added by राज़ नवादवी on December 1, 2018 at 11:30am — 8 Comments

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