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Anwar suhail's Blog – January 2014 Archive (7)

मसीहा...

एक आंधी सी उठे है अन्दर 

एक बिजली सी कड़क जाती है 

एक झोंका भिगा गया तन-मन 

इस बियाबां में यूँ ही तनहा मैं

कब से रह ताक रहा हूँ उसकी...

 

वो जो बौछार से टकराते हुए 

एक छतरी का आसरा लेकर 

इक मसीहा सा बन के आता है 

मुझको भींगने से बचाता है...



हाँ...ये सच है बारहा उसने 

मेरे दुःख की घडी में मुझको 

राहतें दीं हैं....चाहतें दीं हैं....

और हर बार आदतन उसको 

सुख के लम्हों में भूल जाता हूँ 



वो मुझे दुवाओं में…

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Added by anwar suhail on January 26, 2014 at 6:30pm — 5 Comments

उत्तर खोजो श्रीमान जी...

एकदम से ये नए प्रश्न हैं

जिज्ञासा हममें है इतनी

बिन पूछे न रह सकते हैं

बिन जाने न सो सकते हैं

इसीलिए टालो न हमको

उत्तर खोजो श्रीमान जी....

ऐसे क्यों घूरा करते हो

हमने प्रश्न ही तो पूछा है

पास तुम्हारे पोथी-पतरा

और ढेर सारे बिदवान

उत्तर खोजो ओ श्रीमान...

माना ऐसे प्रश्न कभी भी

पूछे नही जाते यकीनन

लेकिन ये हैं ऐसी पीढ़ी

जो न माने बात पुरानी

खुद में भी करती है शंका

फिर तुमको काहे छोड़ेगी

उत्तर तुमको देना…

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Added by anwar suhail on January 21, 2014 at 9:35pm — 5 Comments

लेकिन....

तुम क्या जानो जी तुमको हम 

कितना 'मिस' करते हैं...



तुम्हे भुलाना खुद को भूल जाना है 

सुन तो लो, ये नही एक बहाना है 

ख़ट-पद करके पास तुम्हारे आना है 

इसके सिवा कहाँ कोई ठिकाना है...



इक छोटी सी 'लेकिन' है जो बिना बताये 

घुस-बैठी, गुपचुप से, जबरन बीच हमारे 

बहुत सताया इस 'लेकिन' ने तुम क्या जानो 

लगता नही कि इस डायन से पीछा…

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Added by anwar suhail on January 15, 2014 at 9:01pm — 5 Comments

माल्थस का भूत

कितनी दूर से बुलाये गये 

नाचने वाले सितारे 

कितनी दूर से मंगाए गए 

एक से एक गाने वाले 

और तुम अलापने लगे राग-गरीबी 

और तुम दिखलाते रहे भुखमरी 

राज-धर्म के इतिहास लेखन में 

का नही कराना हमे उल्लेख 

कला-संस्कृति के बारे में...



का कहा, हम नाच-गाना न सुनते 

तो इत्ते लोग नही मरते...

अरे बुडबक...

सर्दी से नही मरते लोग तो 

रोड एक्सीडेंट से मर जाते 

बाढ़ से मर जाते 

सूखे से मर जाते 

मलेरिया-डेंगू से मर जाते …

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Added by anwar suhail on January 14, 2014 at 9:30pm — 8 Comments

बाज़ार के लुटेरे....

खोज रही उनकी टोही निगाहें मुझमे 

क्या-क्या उत्पाद खरीद सकता हूँ मैं...



मेरी ज़रूरतें क्या हैं 

क्या है मेरी प्राथमिकताएं 

कितना कमाता हूँ, कैसे कमाता हूँ 

खर्च कर-करके भी कितना बचा पाता हूँ मैं...



एक से एक सजी हैं दुकाने जिनमे 

बिक रही हैं हज़ार ख्वाहिशें हरदम 

मेरी गाढ़ी कमाई की बचत पर डाका 

डालने में उन्हें महारत है...

 

कैसे बच पाउँगा बाज़ार के लुटेरों से

एक दिन उड़ेल आऊंगा बचत अपनी 

हजारों ख्वाहिशें कहकहा…

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Added by anwar suhail on January 13, 2014 at 7:00pm — 4 Comments

प्रण...

अचानक एक दिन

हुई उसके बचपन की हत्या

विवाह की वेदी ने दिया

एक नया घर-आँगन

एक नया रोल

एक नया अभिनय

एक नया डर...

अचानक एक दिन

ख़त्म हुई नादानियां

दफन हुईं लापरवाहियां

स्याह हुए स्वप्न

भोथरा गईं कल्पनाएँ....

अचानक एक दिन

उठाना पडा भारी-भरकम

संस्कारों का पिटारा

जिम्मेदारियों का बोझ

मानसिक-शारीरिक तब्दीलियाँ

और शिथिल हुए स्नायु-तंत्र...

दीखता नही दूर-दूर तक

इस मायाजाल से…

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Added by anwar suhail on January 6, 2014 at 11:40pm — 7 Comments

खुश हो जाते हैं वे

खुश हो जाते हैं वे

पाकर इत्ती सी खिचड़ी

तीन-चार घंटे भले ही

इसके लिए खडा रहना पड़े पंक्तिबद्ध ...

खुश हो जाते हैं वे

पाकर एक कमीज़ नई

जिसे पहनने का मौका उन्हें

मिलता कभी-कभी ही है

खुश हो जाते हैं वे

पाकर प्लास्टिक की चप्पलें

जिसे कीचड या नाला पार करते समय

बड़े जतन से उतारकर रखते बाजू में दबा...

ऐसे ही

एक बण्डल बीडी

खैनी-चून की पुडिया

या कि साहेब की इत्ती सी शाबाशी पाकर

फूले नही समाते…

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Added by anwar suhail on January 4, 2014 at 9:33pm — 9 Comments

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