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Sushil Sarna's Blog – January 2015 Archive (10)

मानव का मान करो ….

मानव का मान करो ….

सिर से नख तक

मैं कांप गया

ऐसा लगा जैसे

अश्रु जल से

मेरे दृग ही गीले नहीं हैं

बल्कि शरीर का रोआं रोआं

मेरे अंतर के कांपते अहसासों,

मेरी अनुभूतियों के दर पे

अपनी फरियाद से

दस्तक दे रहे थे

दस्तक एक अनहोनी की

एक नृशंस कृत्य की

एक रिश्ते की हत्या की

दस्तक उन चीखों की

जिन्हें अंधेरों ने

अपनी गहराई में

ममत्व देकर छुपा लिया

मैं असमर्थ था

अखबार का हर अक्षर

मेरी आँखों की नमी से

कांप रहा…

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Added by Sushil Sarna on January 28, 2015 at 3:03pm — 22 Comments

तूने व्यर्थ नयन छलकाये हैं…

तूने व्यर्थ नयन छलकाये हैं…

राही प्रेम पगडंडी पर

क्योँ तूने कदम बढाये हैं

हर कदम पर देते धोखे

छलिया हुस्न के साये हैं

तेरे निश्छल भाव को समझें

किसके पास ये फुर्सत है

पल भर में ये अपने हैं

अगले ही पल पराये हैं

व्यर्थ है बादल भटकन तेरी

प्रेम विहीन ये मरुस्थल है

तुझे पुकारें तुझसे लिपटें

कहाँ वो व्याकुल बाहें हैं

हर और लगा बाजार यहाँ

हर और मुस्कानों के मेले हैं

छद्म वेश में करती घायल

बे-बाण यहाँ…

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Added by Sushil Sarna on January 24, 2015 at 12:30pm — 20 Comments

प्रिय ! इस जीवन का तुम बसंत हो ....

प्रिय ! इस जीवन का तुम बसंत हो ....

तुम ही आदि हो तुम ही अनन्त हो

प्रिय ! इस जीवन का तुम बसंत हो

नयन आँगन का तुम मधुमास हो

रक्ताभ अधरों की तुम ही प्यास हो

तुम ही सुधि हो मेरे मधु क्षणों की

मेरे एकांत का तुम ही अवसाद हो

नयन पनघट का  मिलन  पंथ हो

तुम ही आदि हो तुम ही अनन्त हो

प्रिय ! इस जीवन का तुम बसंत हो



इस  जीवन  की  तुम  हो परिभाषा

मिलन- ऋतु  की  तुम  अभिलाषा

भ्रमर  आसक्ति  का  मधु  पुष्प हो…

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Added by Sushil Sarna on January 23, 2015 at 1:06pm — 19 Comments

सांस है मुसाफिर......(एक रचना )

सांस है मुसाफिर.......(एक रचना )

सांस है मुसाफिर इसको  राह में ठहर जाना है

जिस्म के  पैराहन को  जल के बिखर जाना है

दुनिया को मयखाना  समझ नशे में ज़िंदा रहे

होश आया तो समझे कि ख़ुदा  के घर जाना है

याद किसकी सो  गयी  बन के अश्क आँख में

धड़कनें समझी न ये  जिस्म  को मर जाना है

ज़िंदगी समझे जिसे  दरहक़ीक़त वो ख़्वाब थी

सहर होते ही जिसे बस रेत सा बिखर जाना है

कतरा-कतरा  प्यार  में जिस के हम मरते रहे …

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Added by Sushil Sarna on January 22, 2015 at 3:30pm — 18 Comments

प्यार का समन्दर हो .....

प्यार का समन्दर हो .....

किसको लिखता

और क्या लिखता

भीड़ थी अपनों की

पर कहीं अपनापन न था

एक दूसरे को देखकर

बस मुस्कुरा भर देना

हाथों से हाथ मिला लेना ही

शायद अपनेपन की सीमा थी

खोखले रिश्ते

बस पल भर के लिए खिल जाते हैं

इन रिश्तों की दिल में

तड़प नहीं होती

यादों का बवण्डर नहीं होता

बस एक खालीपन होता है

न मिलने की चाह होती है

न बिछुड़ने का ग़म होता है

इसलिए ट्रेन छूटने के बाद

मैंने उसे देने के लिए

हाथ में…

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Added by Sushil Sarna on January 19, 2015 at 3:55pm — 17 Comments

ग़म मौत के .......(एक रचना )

ग़म मौत के ......(.एक रचना )

ग़म  मौत  के  कहाँ  जिन्दगी भर साथ चलते हैं

चराग़  भी  कुछ  देर  ही किसी के लिए जलते हैं



इतने  अपनों  में  कोई  अपना नज़र नहीं आता

अब  तो  रिश्ते  स्वार्थ  की कड़वाहट में पलते हैं



दोस्ती  राहों  की  अब राह में ही दम तोड़ देती है

अब किसी के लिए कहाँ दर्द आंसुओं में ढलते हैं



मिट  जाते  हैं  गीली  रेत पे मुहब्बत भरे निशाँ

फिर  भी  क्यूँ  लोग  गीली रेत पे साथ चलते हैं



सच  को छुपा कर लोग…

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Added by Sushil Sarna on January 15, 2015 at 4:10pm — 10 Comments

युग्मों का गुलदस्ता …

युग्मों का गुलदस्ता …



एक  पाँव  पे  छाँव  है  तो  एक  पाँव  पे   धूप

वर्तमान  में  बदल  गया  है  हर रिश्ते का रूप



अब  मानव  के  रक्त  का  लाल  नहीं   है   रंग

मौत  को  सांसें  मिल  गयी  जीवन हारा  जंग



निश्छल प्रेम अभिव्यक्ति के बिखर गए हैं पुष्प

अब  गुलों  के  गुलशन  से  मौसम  भी  हैं रुष्ट



तिमिर  संग  प्रकाश  का  अब  हो गया  है मेल

शाश्वत  प्रेम अब बन गया है शह मात का खेल



नयन  तटों  पर  अश्रु  संग  काजल…

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Added by Sushil Sarna on January 9, 2015 at 12:30pm — 20 Comments

ये किसकी हया को .... (एक रचना)

ये किसकी हया को .... (एक रचना)

ये किसकी हया को  छूकर  आज बादे सबा आयी है

दिल की हसीन  वादियों में ये किसकी सदा आयी है

होने लगी है सिहरन क्यूँ अचानक से इस जिस्म में

किसकी पलक ने अल-सुबह ही आज ली अंगड़ाई है

छोड़ा था इक ख़तूत जो  कभी हमने उस दहलीज़ पे

छू के उसकी आग़ोश  को ये सुर्ख़ हवा आज आयी है

बिन पिये ही मयख़ानों से  क्यूँ रिन्द सब जाने लगे

किसने अपने  रुख़्सार  से  चिलमन आज हटायी है

हमारी  तरह  बेताबियाँ…

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Added by Sushil Sarna on January 6, 2015 at 8:28pm — 10 Comments

नव वर्ष कहलायेगा.............

नव वर्ष कहलायेगा.......

ऐ भानु

तुम न जाने

कितनी सदियों को

अपने साथ लिए फिरते हो

सृजन और संहार को

अपने अंतःस्थल में समेटे

खामोशी से

न जाने किस लक्ष्य की प्राप्ति में

प्रतिदिन स्वयं की आहुति देते हो

आश्चर्य है

धरा के संताप हरने को

अपने सर पर ताप लिए फिरते हो

आदिकाल से

प्रतिदिन अपनी केंचुली बदलते हो

हर आज को काल के गर्भ में सुलाते हो

फिर नए कल के लिए

नए स्वप्न लिए भोर बन के आते हो…

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Added by Sushil Sarna on January 2, 2015 at 1:00pm — 14 Comments

साथ मेरे ज़िंदगी की …

साथ मेरे ज़िंदगी की …(एक रचना )

साथ  मेरे ज़िंदगी  की रूठी किताब रख देना

जलते चरागों में  बुझे  वो  लम्हात रख देना

रात भर सोती रही शबनम जिस आगोश में

रूठी बहारों में वो सूखा  इक गुलाब रख देना

कहते कहते रह गए  जो थरथराते से ये लब

साथ मेरी  धड़कनों  के वो जज़्बात रख देना

आज तक न दे सके जवाब जिन सवालों का

साथ मेरे  वो सिसकते कुछ जवाब रख देना

मिट गयी थी दूरियां  भीगी हुई जिस रात में

एक मुट्ठी…

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Added by Sushil Sarna on January 1, 2015 at 1:22pm — 18 Comments

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