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Dr.Prachi Singh's Blog – April 2016 Archive (6)

बहुत मुमकिन है दिल की उलझनों का रुख बदल जाए... ग़ज़ल//डॉ. प्राची

1222,1222,1222,1222



अभी है वक्त हाथों में, कहीं ना ये निकल जाए

जरा लहज़ा बदल लें तो, जो बिगड़ा है सम्हल जाए



नज़र भर कर हमें देखो, फिर अपने दिल से सच पूछो

बहुत मुमकिन है दिल की उलझनों का रुख बदल जाए



हमें भी दिल की सब बातें तुम्हें खुल कर बतानी हैं

अभी ठहरो उजाला है ज़रा सी साँझ ढल जाए



लहर से तट का हर पत्थर किया करता है अठखेली

यहाँ डग सोच कर भरना, कहीं ना पग फिसल जाए



तुम्हें अपना समझ बैठेगा इसमें अक्स मत देखो

बहुत मासूम… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on April 27, 2016 at 2:15pm — 7 Comments

आहों को हम रख लेते हैं...गीत//डॉ. प्राची

तुमको बहुत मुबारक मंज़िल, राहों को हम रख लेते हैं।

खुशियों की सौगातें तुम लो, आहों को हम रख लेते हैं।



कसमें वादे तोड़ चले तुम,

हमको तन्हा छोड़ चले तुम,

जोड़ी थीं जो राहें तुमने

उनको खुद ही मोड़ चले तुम,

तूफ़ाँ देख मुङो तुम, पर मझधारों को हम रख लेते है....



हर इक रंग तुम्हीं से लेकर

सतरंगी थे ख्वाब सँवारे,

तुम क्या बिछुड़े,अब तो अपने

साथी हैं केवल अँधियारे

सुबह सुनहरी तुम ही रख लो, रातों को हम रख लेते हैं....



गीली मेहँदी, महके… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on April 25, 2016 at 10:28am — 9 Comments

उफ़ अपनी चाहत का पन्ना बन बैठा रद्दी अखबार

चाहा था रामायण होता अपने सपनों का संसार

उफ़! अपनी चाहत का पन्ना, बन बैठा रद्दी अखबार



श्रद्धानत हो शीश झुकाते

उस पर तुलसी पत्र चढ़ाते,

मन मंदिर में प्रेम भाव ले

पुष्पों का शृंगार सजाते,

मन के भाव ज़रा भटके तो, रिश्तों में खटका व्यवहार...



शंखनाद सी गूँजा करती

थी मन में आवाज़ तुम्हारी,

संयम नेह झलकता था तब

बात तुम्हारी थी हर प्यारी,

चीखमचिल्ली चुभती बातें, करतीं बस अब तो चीत्कार...



कुछ हम भूले कुछ तुम भूले

गठबंधन के… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on April 22, 2016 at 11:44am — 6 Comments

चाहत की रस्म हमने निभाई कुछ इस तरह...ग़ज़ल// प्राची

2212,121,122,1212

पल में हुई मैं खुद से पराई कुछ इस तरह

थामी उन्होंने हाय! कलाई कुछ इस तरह



नस-नस में सिहरने हैं, निगाहों में है सुरूर

साँसों में उनकी याद समाई कुछ इस तरह…

Continue

Added by Dr.Prachi Singh on April 20, 2016 at 3:47pm — 5 Comments

जो कर सको तो दुआ करो (ग़ज़ल ) ..डॉ० प्राची

११२१२, ११२१२, ११२१२, ११२१२ 

मुझे ज़िन्दगी की तलाश है, मुझे ख़्वाब में न मिला करो।

न करो कभी कोई वायदा, जो करो तो फिर न फिरा करो।



वो जो चीर दे कोई पाक दिल, न ही तंज ऐसे कसा करो।

बड़ी मुश्किलों से भरा हो जो, न वो जख़्म फिर से हरा करो।…

Continue

Added by Dr.Prachi Singh on April 11, 2016 at 2:48pm — 5 Comments

सपनों को सजा कर देखूँ (ग़ज़ल)// डॉ. प्राची

2122, 1122, 1122, 22



खुद को मिट्टी में चलो फिर से मिला कर देखूँ।

आख़िरी बार सही, रिश्ता निभा कर देखूँ।



उसने सीने में ही बारूद छिपा रक्खा है,

कैसे चिंगारियाँ नफरत की बुझा कर देखूँ?



दर्द अब रूह तलक मुझको न झुलसा डाले,

उफ़! ये लावा मैं कहाँ आज बहा कर देखूँ?



ज़िन्दगी मौत की दहलीज़ पे लाई, फिर भी-

दिल ये कहता है कि सपनों को सजा कर देखूँ।



मुख जो मोड़ा था हकीकत से, हुआ क्या हासिल?

कर के हिम्मत ज़रा नज़रें तो मिला कर… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on April 6, 2016 at 1:21pm — 4 Comments

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