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केवल प्रसाद 'सत्यम''s Blog – April 2015 Archive (7)

दोहा.....सत्यांजलि

सत्यांजलि



धन्य धन्य हे मात तू, धन्य हुआ यह पूत।

असहायों की मदद कर, यश-धन मिला अकूत।।1



क्षितिज द्वार पर नित्य ही, कुमकुम करे विचार।

स्वर्ण किरण के जाल में, क्यों फॅसता संसार।।2



उपकारी बन कर फलें, ज्यों दिनकर का तेज।

दिन भर तप कर दे रहा, रात्रि सुखद की सेज।।3



धर्म कार्य जन हित रहे, चींटी तक रख ध्यान।

मात्र द्वेष निज दम्भ रख, ज्ञानी भी शैतान।।4



जनहित मन्तर धर्म का, स्वार्थी पगे अधर्म।

सच्चा सेवक त्यागमय,…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 30, 2015 at 9:30pm — 8 Comments

...जागते रहो

....जागते रहो

शहर के उस कोने में बजबजाता

एक बड़ा सा बाजार

जहॉ बिखरे पड़े हैं सामान

असहजता के शोरगुल में

तोल-मोल करते लोग

कुछ सुनाई नहीं देता

बस!  दिखाई देता है,  एक गन्दा तालाब

उसमें कोई पत्थर नहीं फेंकता

उसमे तैरती हैं...मछलियां, बत्तखें और

बेखौफ पेंढुकी भी

वे जानती है, और सब समझतीं भी हैं...

इस संसार में सब कुछ बिकाऊ हैं-

कुछ पैसे लेकर और कुछ पैसे देकर

यहां शरीर से लेकर आस्था तक, .....सब!

तालाब की मिट्टी में सने ...देव…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 27, 2015 at 9:42pm — 14 Comments

कर्त्तव्यो की अजब कहानी...

कर्त्तव्यो की अजब कहानी, जीवन भर करता नादानी।

भूख लगे तो चिल्लाता यों, सारे जग का मालिक है वो।

शोषण का अपराध हृदय में, खोखल तना घना लगता वो।।

हाथ, पैर, मुख कर्म करे पर, अॅखियॉं मूंद करे बचकानी।

कर्त्तव्यो की अजब कहानी, जीवन भर करता नादानी।। 1

दया-करूण की ममता देवी, निश्छल अन्तर्मन की वेदी।

नहीं जरा भी रूक पाती है, करूणा-ममता बरसाती है।।

जीवन भर उल्लास बॉंट कर, पीती सदा नयन से पानी।

कर्त्तव्यो की अजब कहानी, जीवन भर करता नादानी।।…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 24, 2015 at 6:35pm — 3 Comments

वर्षा---

वर्षा,

हर्ष-विषाद से मुक्त

चंचल, चपल, वाकपटुता में

मेढकों की टर्र-टर्र

रात के सन्नाटो में भी

झींगुरों के स्वर

सर-सराती हवाओं के संग लहराती

चिकन की श्वेत साड़ी

लज्जा वश देह से लिपट कर सिकुड् जाती

वनों की मस्त तूलिकाएं स्पर्श कर

रॅगना चाहतीं धरा

हरियाली, सावन, कजरी का मन भी

उमड़ता, प्यार-उत्साह...जोश 

म्यॉन से तलवारें खिंच जाती.....द्वेष में

चमक कर गर्जना करती

बादलों की ओट से

आल्हा, राग छेड़ कर ताल ठोंकते

दंगल, चौपालों की…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 21, 2015 at 7:01pm — 14 Comments

समाचार- पत्र

समाचार - पत्र

प्रात:

नित्य क्रिया से निव्रुत्ति होकर

चींखती- सुप्रभात....!

आँंगन में फड़फड़ा कर गिरता

समाचार-पत्र

सुबुकता, कराहता,  आहें भरता

दुर्भिक्षों सा

कातर दृष्टि में अपेक्षा के स्वर

आशा, सहयोग, सद्भावना...

किन्तु, सर्वथा.....अर्थ हीन

उपेक्षा का भाव...

सुरसा सा आकार लेता.

घायलों का अधिक रक्त स्राव

प्राण तक छीन लेती

क्षण भर की देरी

मंजिल के पास ही -

चौराहों की लाल बत्ती…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 17, 2015 at 9:47am — 4 Comments

मनहरण घनाक्षरी

मनहरण घनाक्षरी -

इस छन्द का विन्यास 8, 8, 8, 7  वर्णो की आवृति पर अथवा 16-15 वर्णों की यति पर कुल 31 वर्ण से किया जाता हैं।  इसके चरणान्त में ।s लघु गुरू या s।s गुरू लघु गुरू रखने पर लय-गति में निरन्तरता बनी रहती है।

1

अम्ब, अम्ब सत्य ज्ञान, ताल छन्द के विधान,

रास रंग संग में उमंग के प्रमान हैं।

दिव्य शुभ्र शारदे बिसार के कलंक काल,

सूर्य-चन्द्र ज्योति से सजा रही वितान है।।

अखण्ड ब्रह्म तेज में, धरा-व्योम प्रेम करें

सृ-िष्ट रूप में अनादि…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 14, 2015 at 10:00pm — 5 Comments

गजल- आत्मा भरपूर सी ....

गजल-  आत्मा भरपूर सी...

बह्र - 2122, 2122, 2122, 212

फिर मुझे वह हूर सी लगने लगी।

दुश्मनी भी नूर सी लगने लगी।

गंग जन - मन को सदा पावन करे,

वास्तव में सूर सी लगने लगी।

तट, नदी का मध्य भी उकता गया,

रेत - पन्नी घूर सी लगने लगी।

आस्था की डुबकियॉं नित स्वर्ग हित,

बेवजह मगरूर सी लगने लगी।

आदमी सर-झील-नदियॉं पाट कर,

हस्तियॉं मशहूर सी लगने लगी।

आपदाएं नित्य घर-मन दाहतीं,…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 14, 2015 at 12:30pm — 10 Comments

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